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________________ अध्याय : पाठवां ] [ ६३१ __ भक्त्या प्रमुरतं मनसा सुरेन्द्र, पासपरजीवितमेत्यदेवाः । तस्मादनंतरभवे वितनिष्यमाणं । ___ तोर्थ भवोदधिसमुत्तरणकतीर्थम् ॥१५४६॥ जिनकी देवगति सम्बन्धी आयु के छह माह शेष रहे हैं तथा जो आगामी जन्म में संसार समुद्र को तरकर जाने के लिये अद्वितीय घाट सदृश धर्मतीर्थ का प्रसार करने वाले हैं, ऐसे उस प्राणतेन्द्र के समीप जाकर अनेक देवता अन्तःकरण पूर्वक प्रणाम करने लगे थे। ऐसी भक्ति पूर्वक समाराधना पूर्णतया स्वाभाविक है। होनहार तीर्थ कर देवराज को स्वर्ग में देखकर देवों को देवियों को, तथा देवेन्द्रों को ऐसा हर्ष होता है कि जैसे सूर्य दर्शन से कमलों को आनन्द प्राप्त होता है और वे विकास को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार किसी जगह पर कोई अद्भुत निधि अल्प काल के लिये आ जाए तो उसके दर्शन के लिये सभी नागरिक गए बिना नहीं रहते। इसी प्रकार छह माह के पश्चात् स्वर्ग को छोड़कर मनुष्य लोक प्रयाण करने वाली उस परम पावन प्रात्मा की सभी देव अभिवन्दना द्वारा अपने को कृतार्थ अनुभव करते हैं। भगवान् छह माह पश्चात् स्वर्ग लोक का परित्याग करने वाले हैं, इसलिये इस पुण्यात्मा का अनुगमन करने वाली लक्ष्मी छह माह पूर्व ही स्वर्ग से मध्य लोक में रत्नवृष्टि के बहाने से जा रही थी। जिनसेन स्वामी की कल्पना कितनी मधुर है संक्रन्दननियुक्तेन धनदेन निपातिता । साभात् स्वसंपदौत्सुक्यात प्रस्थितेयाप्रतो विभोः ।।१५४७।। इन्द्र के द्वारा नियुक्त हुए कुबेर के द्वारा जो रत्नों की वर्षा हो रही थी, वह इस प्रकार शोभायमान होती थी; मानों जिनेन्द्र देव की संपत्ति उत्सुकतावश उनके आगमन के पूर्व ही आ गई हो । * पंचकल्याणक * तीर्थकरों के पंचकल्याण या पंचकल्याणक--तीर्थकर भक्ति में उनकी अनेक विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। वृषभादि महावीर पर्यन्त चौबीस. तीर्थंकरों. का प्रथम विशेषरा है, 'पंचमहाकल्याणसंण्णा ' वे पंच महान कल्याणकों को
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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