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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राप्त हैं । अतएव प्रभु के पंच कल्याणका आदि के विषय में संक्षेप में प्रकाश डालना उचित प्रतीत होता है।
इस संसार को पंच प्रकार के संकटों अकल्यासों को आश्रय भूमि माना गया है । उनको द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भावरूप पंच परावर्तन कहते हैं। तीर्थकर भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान तथा मोक्ष का स्वरूप चितवन करने वाले सत्पुरुष को उक्त पंच परावर्तन रूप संसार में परिश्रम का कष्ट नहीं उठाना पड़ता है। उनके पुण्यजीवन के प्रसाद से पंच प्रकार के अकल्याण छूट जाते हैं। तथा यह जीव मोक्ष रूप पंचमगति को प्राप्त करता है । पंच अकल्याणों के प्रतिपक्ष रूप तीर्थकर के जीवन गर्भ जन्मादि पंच अवस्थाओं की पंच कल्याण' या अल्यारएक नाम से प्रसिद्धि है। इन पांच प्रसंगों पर समस्त इन्द्रादिक श्राकर महान् पूजा उत्सवों को करते हैं। इन उत्सवों को पंच कल्याणक कहते हैं ।
प्रश्न :- अयोध्यानगरी को रचना किस प्रकार है ?
उत्तर:- अयोध्या नगरी की रचना-जिनेद्र भगवान के गर्भ में आने के छह माह पूर्व से ही इस वसुन्धरा(भूमि )में भावी तीर्थंकर के मंगलमय आगमन की महत्ता को सूचित करने वाले अनेक कार्य सम्पन्न होने लगते हैं।
भगवान वृषभदेव के माता मरुदेवी के गर्भ में आने के छह माह पूर्व ही इन्द्र की आज्ञानुसार देवों ने स्वर्गपुरी के समान 'अयोध्या' नगरी की रचना की । उसे साकेता, विनीता तथा सुकोशलापुरी भी कहते हैं। उस नगरी की अपूर्व रमणीयता का कारण महाकवि जिनसेन स्वामी के शब्दों में यह था
स्वर्गस्यैव प्रतिच्छंदं भूलोकेऽस्मिन् निधियुभि ।। विशेषरमरणीयेव निममे सामरैः पुरी ॥१५४८॥
देवों ने उस नगरी को विशेष मनोहर बनाया । इसका कारण यह प्रतीत होता है कि देवताओं की यह इच्छा थी कि मध्यलोक में स्वर्ग की एक प्रतिकृति हो ।
उस नगरी के मध्य में सुरेन्द्र भवन से स्पर्धा करने वाला महाराज नाभिराज के निवासार्थ नरेन्द्र भवन की रचना की गई थी, उनकी दिवालों में अनेक प्रकार के दीप्तिमान मरिण लगे थे । सुवर्ण मय स्तंभों से वह समलंकृत था। पुष्प, मूगा, मुक्तादि की मालाओं से शोभायामान था । हरिवंश पुराण में लिखा है कि उस राजभवन का
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