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________________ अध्याय : दसवां ] प्रा. कुन्द कुन्द, मूलाचार, ५१६४/प्र. सा. १४ पृ. १४२ जो यति स्वद्रव्य और परद्रव्य को, सुत्रार्थ को अच्छी तरह से जानता है । जो भव्यात्मा यति पुरुष संयम और तप युक्त है तथा जो वीतराग भाव से लबालब भरपूर है एवं सुख व दुःख जिन्होंने समान मान रक्खा है। ऐसे श्रमण को परमागम में शुद्धोपयोगी कहा है। एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यंत जीव मात्र के प्रति समता भाव रखना मैत्री है। "प्रगकंपासुद्ध बोगो विय पुण्गास्स पासव द्वारं । शिवार्य. भगवति. पा. १६२४ अणुकम्पा और शुद्धोपयोग पुग्यास्त्र के द्वार हैं । "पृष्गास्मासव भूदा अणकम्पा शुद्ध एव उबोगो" ॥१६७१॥ . ___ मू. ५/४८ जयवधवल ५२ पृ. ५३ शुध्दोपयोग और अनुकम्पा भी निश्चय से पुण्यास्त्रव के कारण हैं। अणुकम्पा हृदय क्षेत्र की वह पवित्र गङ्गा है, जो अमृत रस से भरपुर है । सामायिक का सच्चा अधिकारी वही है, जो अनुकम्पा के रस से अपने समस्त हृदय विकारों का प्रक्षालन कर लेता है । "प्रत्र शुध्दोपयोगाभिमुखस्य शिक्षण मुक्तम्" नियमसार गा, १४८ यहां शुध्दोपयोगाभिमुख जीव को शिक्षा कही है। "राग'ष रहित परिणाम सो शुध्दोपयोग” । मोक्ष मार्ग प ८/४२० द्रव्यानुयोगविर्षे प्रात्म परिणाम निकी मुख्यता करि निरूपण कीजिये हैं। असंयतसम्यग्दृष्टि-भावक-प्रमत संयतेषु पारम्पर्येण शुध्दोपयोग साधक, उपर्यु परितार तम्येन शुभोपयोगो वर्तते. वृ. द्र. सं. ३४/५ १४ चौथे, पांचवें और छठे गुणस्थान में पारम्पर्यग-परम्परा से शध्दोपयोग का साधक शुभोपयोग उत्तरोत्तर वृश्दिरुप तारतम्य रुप से शुभ परिणाम होते हैं। सम्मं विदिर पदस्थाचत्ता उहि बहिस्थमज्भत्थं । . विसयेसु सार सत्ता में सुत्ति रिपट्ठिा ॥१६७२।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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