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________________ हो. चिन्तामणि जो सम्यक् रूप से पदार्थों को जानते हैं और बाह्य तथा अन्तरंग परिग्रह को छोड़कर पांचों इन्द्रियों के विषयों में अनासक्त है, उन शुध्दात्माओं को शुध्दोपयोगी कहा है। कर्माधान क्रिया रोधः स्वरूया चरखं च यत् । धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात् सैष चारित्र संज्ञकः ॥१६७३।। कर्मों के ग्रहण करने की क्रिया का रुक जाना ही स्वरूपाचरण है, वहीं धर्म है । वही शुध्दोपयोग है और वहीं चारित्र है। प्रश्न :-शुद्धोपयोग और अशुद्धोपयोग का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-सकल विमल केवल ज्ञान दर्शन द्वयं शुध्दोपयोगः, मतिज्ञानादि रूपो विकलोऽशुध्दोपयोग इति द्विविधोपयोगः। अव्यक्त सुख दुःखानुभव रूपा कर्मफल चेतना, तथैव भतिज्ञानादि, मनपर्थयः पर्यन्तम शुध्दोपयोग इति । स्वेहा पूर्वेष्टा निर्विकल्प रूपण विशेष राम द्वेष परिणमनं कर्म चेतना, केवल ज्ञान रूपा शुध्द चेतना इत्युक्त लक्षणोपयोगश्चेतना च यत्र नास्ति स भवत्य जीव इति विज्ञेयः । वहद द्रव्य सं. गा. १५ पृ. ५० पूर्णनिर्मल केवलशान, केवलदर्शन ये दोनों शुद्ध उपयोग हैं और मतिज्ञान प्रादि रूप विकल-अशुध्द--उपयोग है, इस तरह उपयोग दो प्रकार का है । अव्यक्त सुख दुःखानुभव स्वरूप कर्मफल चेतना है । तथा मतिज्ञान प्रादि मन: पर्यय तक चारों ज्ञान रूप अशुद्ध उपयोग तथा निज चेष्टा पूर्वक, इष्ट, अनिष्ट, विकल्प रूप से विशेष राम द्वष रूप जो परिणाम हैं, वह "कर्भ चेतना" है। केवल ज्ञान "शुद्ध चेतना" है । इस तरह पूर्वोक्त लक्षण वाला उपयोग तथा चेतनायें जिसमें नहीं है, वह "अजीव" है, ऐसा जानना चाहिए। शुद्धोपयोग निर्विकल्प है.--- शुद्धस्यात्मोपयोयः स्वयं स्यात् ज्ञान चेतना । निर्विकल्पः स एवार्थदर्था संक्रान्त सङ्गते ।।१६७४।। शुद्धात्मानुभव रुप जो उपयोगात्मक "ज्ञान चेतना" है, वह भी वास्तव में निर्विकल्पक ही है । क्योंकि जितने काल तक शुद्धात्मानुभव होता है, उतने काल तक ही उपयोगात्मक ज्ञान चेतना है (यह भी वास्तव में) कहलाती है । और उस काल में शुद्धात्मा से हटकर दूसरे पदार्थो की ओर ज्ञान जाता नहीं है, इसलिए उस समय
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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