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________________ ६६६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि पर्याय, चंपाबहिन आदि का उनकी स्त्री होना स्मरण है । तो यह भी तो स्मरण होगा ff froraft की भाषा प्राकृत अपभ्रंश थी या वह अनक्षरी थी ? कितने बार दिव्यध्वनि खिरती थी, मुख्य प्रश्नकर्ता गृहस्थ का क्या नाम था ? मुख्य गणधर कौन थे ? face के लोगों की ऊंचाई भोजन आदि के बारे में भी जातिस्मरण उद्बोधन करा देता । इस विषय में वे चुप हैं । श्रतः जाति स्मरण आदि की बात शत-प्रतिशत असत्य तथा कल्पना जाल मात्र है। तीर्थंकर सीमंधर भगवान की दिव्यध्वनि को सुनकर श्रात्म ज्ञान प्राप्त करने वाला सम्यक्त्वी नियम से स्वर्ग जाता कारण अविरत गुणस्थानवर्ती सम्यक्त्वी मनुष्य मरण कर स्वर्ग ही जाता है । यदि उसने आयु बंध नहीं किया है । मनुध्यायु का बंधक मानव मरकर भोगभूमि का मनुष्य होता । तथा सौराष्ट्र में जन्म धारण नहीं करता । यह बात भी विचारणीय है कि विदेह में दीर्घायु मनुष्य होते हैं । जिनकी एक कोटि पूर्व प्रमाण श्रायु श्रागम में कही है । श्राचर्य है कि दो हजार वर्ष के भीतर ही तथा कथित राजकुमार ( वर्तमान स्वामीजी ) विदेह से यहां मररणकर कैसे आ गये ? शिष्या चंपाबेन का भी शीघ्र मरगा विदेह में कैसे हो गया ? यह याद है क्या ? यह भी सोचना चाहिये कि तीर्थंकर के चरणों के समीप तत्त्वज्ञान रूप श्रमृतपान करने वाला जन्म से सम्यत्वहीन परिवार में कैसे उत्पन्न हुआ और कैसे बहुत समय तक मिथ्या साधु बनकर उस जीव ने धर्म के विपरीत प्रचार किया ? यदि पूर्व के ऊच्च संस्कार होते तो वह व्यक्ति इन्द्रियों की दासता को छोड़कर हीन प्रवृत्ति त्यागरूप सदाचार को अवश्य ग्रहण करता । उदाहरणार्थ प्राचार्य शांतिसागर महाराज पूर्व भव के ऊच्च संस्कारी थे । इससे बचपन से ही उनके मन में वैराग्य के भाव विद्यमान थे और वे दीक्षा लेकर मुनि बनना चाहते थे । यद्यपि अपने पिता श्री भीममौड़ा पाटील के कहने से बहुत समय तक गृह त्याग नहीं कर सके थे । : कानजी पंथी वर्ग में मिथ्या बातें प्रचारित की जाती है । जिससे उनके पथ का अधिक प्रचार हो ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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