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अध्याय : दसवां ]
[ १६७ शंका :-कुदकुद स्वामी ने छन्दशास्त्र को कठिनतावश अ सकेवली शब्द
का उपयोग किया ? समाधान :-यदि काव्य शास्त्र की कठिनाई थी, तो वे केवलि सुयकेवली भरिणय शब्द का प्रयोग कह सकते थे। नियमसार के मंगलाचरण के अनुसार वे उपरोक्त रूप में कह सकते थे। नियमसार में उन्होंने कहा है :
"वोच्छामि नियमसारं केवलि सुयकेवलि भरिणदं"
इससे इस बात की असत्यता स्पष्ट हो जाती है । जो कानजी महोदय कहा करते हैं कि समयसार साक्षात् तीर्थकर की वाणी सुनने के बाद रचा गया है । सम्यक् चिंतन इस कथन को झूठा प्रमाणित करता है ।
कानजी पंथी पत्र "प्रात्मधर्म' में छपा था कि कुदकुद स्वामी विदेह गये थे। तब कानजी "राजकुमार" की पर्याय में समवसरण में थे, (विदेह में शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष होती है । अतः वे राजकुमार उतने ही उकच शरीर के रहे होंगे) समवशरण में अनेक अंगपूर्व के ज्ञाता, अनेक ऋद्धिधारी महामुनि आदि भी ये कि राजकुमार की कुदकुद स्वामी पर ही विशेष दृष्टि रही पाई । "आत्मधर्म" पत्र कहता है । "कुदकुद प्राचार्य बहां आठ दिन ठहरे थे।
समीक्षा:-साक्षात तीर्थकर का सानिध्य पाकर भरत क्षेत्र से विदेह जैसे सुदूरवर्ती प्रदेशों में पहुँचकर केवल पाठ दिन पर्यंत वहां आवास कर कुदकुद स्वामी का शीघ्र भरत क्षेत्र को वापिस लौट पाने का कथन यह ध्वनित करता है कि कानजी बाबा की बात सत्य की कसौटी पर कसने लायक नहीं है । कसौटी पर सोना कसा जाता है । टीन का टुकड़ा नहीं। कोई भी समझदार आदमी सोच सकता है । कि श्रेष्ठ प्रात्म कल्याण के साधन को पाकर विवेकी व्यक्ति अधिक से अधिक काल यापन कर स्वहित संपादन करता है। दक्षिण भारत के यात्रा करने वाले साधु जब शिखरजी पहुँचते है। तो वे वहां अधिक से अधिक समय देने का प्रयत्न करते हैं । संघ के संचालक का गृहस्थ होने के कारण कदाचित शिखरजी में अधिक रुकना सम्भव भी न हो किन्तु विदेह में रुकने में कोई भी बाधा नहीं थी। करण कोई संघ संचालक नहीं था। मुनीश्वर होने से कोई लौकिक झंझट भी नहीं हो सकती।
गहरा माया जाल :- यदि कानजी बाबा को विदेह में अपनी राजकुमार