SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1056
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि बुद्धिमत्ता है । वही सच्चा मार्ग है। एकांत पक्ष कुगतिप्रद है। यह जिनेश्वर का स्याद्वाद चक्र एकान्तवाद का नाश करता है। शंका :-कानजी पंथी मंडली में अनेक अद्भुत बातें प्रचलित होती रहती हैं। वहां कहा जाता है कि कुन्दकुन्द स्वामी विदेह गये थे तथा सीमंधर तीर्थंकर की दिव्य वाणी सुनने के पश्चात् समयसार रूप श्रेष्ठ शास्त्र उन्होंने बनाया । इससे एकांतवादी वर्ग उस महाशास्त्र को ही अपनी सर्वोच्च निधि मानते हैं। तथा अन्य शास्त्रों के प्रति हीनता की भावना रखा करते हैं। समीक्षा :–कुन्दकुन्द स्वामी विदेह गए या नहीं। इस चर्चा से यहां प्रयोजन नहीं है। प्राचीन शिलालेखों में कुदकुद स्वामी की तरह पूज्यपाद स्वामी के विदेह गमन की चर्चा है। श्रवणवेल गोल के १०२ नं. के शिला लेख में पूज्यपाद स्वामी के बारे में कहा है । "देवयूजित!" वे देव पूजित थे । विदेह-जिनदर्शन पूतगात्र :--विदेह के जिनेश्वर के दर्शन से उनका शरीर पवित्र हो चुका था, अप्रतिमौषद्धि :-लोकोत्तर औषधि ऋद्धि से वे युक्त थे । यत्पाद धौतजल स्पर्शात कालायसं किस सक्ष कनक, वकार को करण के सालिन से प्राप्त जल के स्पर्श द्वारा लोहा स्वयं हो जाता था, इससे यह प्रतीत होता है । उस पुरातन युग में विशेष सिद्धि सम्पन्न अनेक साधु रत्न हो गये हैं। जिनका हमें पता नहीं है । पूज्यपाद स्वामी की श्रेष्ठ श्रुत सम्प्रति का बोध उनको अध्यात्मिक रचना इष्टोपदेश समाधि शतक के सिवाय सर्वार्थसिद्धि, जैनेन्द्र व्याकरण आदि से होता है। अतः विदेह गमन करने से प्राप्त महत्ता कुदकुद स्वामी के समान- पूज्यपाद महर्षि को भी प्राप्त होती है। और उनकी रचनाओं को भी विशिष्टता ध्यान में पाती है। यह बात विशेष चिन्तनीय है कि समयसार यदि विदेह यात्रा के पश्चात् रचित होता तो. कदक द स्वामी उस प्रथ को सुतकेवली भरणीय अर्थान्त श्रत केवली कथित न कहते । उन्होंने समयसार के मंगलाचरण में कहा है : "वोच्छामि समय पाहुड मिणमो सुय केवली भरिणयं ।।११ मैं (कुदकुद) भुत केवली (भद्रवाहुगुरु) कथित समयसार को कहता हूँ। केवली शब्द के पूर्व में "थत" शब्द सर्वज्ञ केवली का निराकरण करता है। जैसे । घोड़ा शब्द के पूर्व यदि सफेद विशेषण लगा हो तो उससे श्याम वर्गीय अश्व का । निराकरण हो जाता है। परोक्षज्ञानी व तकेवली प्रत्यक्षज्ञानी केवली से भिन्न हैं। .:.... .A EYE
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy