________________
अध्याय : दसवां 1
[ ६६९ आत्म धर्म के कानजी (८७वीं) जयंती अंक में अनेक असत्य बातों का वर्णन पढ़कर आश्चर्य होता है कि अपने मिथ्या प्रेरित पक्ष को पुष्ट करने के लिये किस प्रकार माया तथा असत्य का आश्रय लेते हैं । कानजी अपने भक्तों से कहते हैं मेरा यह भव तीर्थकर प्रकृति का बंध होगा" साक्षात् तीर्थकर भगवान के समवशरण में चंपा बहिन ने यह बात सुनी है। गुरुदेव ने चंपा बहिन से कहा बहिन यह हकीकत सत्य है । मुझे भी कई बार ऐसा भास होता था उसका स्पष्ट हल नहीं मिलता था ।
उसका अर्थ समझ में पाया कि मैं तीर्थकर का जीव हैं।
वे अपने जीवन के बारे में बताते हैं । १७ वर्ष की उमर में रामलीला देखकर उनके हृदय में वैराग्य की मस्ती चढ़ गई। विक्रय संवत् १९७८ में ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी के दिन स्वाध्याय कर के वे लेटे तो ओंकार ध्वनि का नाद व साढ़े बारह करोड़ बाजों की ध्वनि का स्मरण हुआ । पृष्ठ १८ । "तीर्थंकर के साथ" लेख में एक भक्त इस प्रकार स्तुति करता है । उनका वर्तमान जीवन देखों, तो चैयन्य भगवान की भनक से भरा है । उनका भावी जीवन देखो तो भगवान से सम्बन्धित । यदि हम ज्ञान को मात्र चार भव तक लम्बाकर देख सके तो हमें गुरुदेव के बदले में साक्षात् "सूर्य" के समान तेजस्वी तीर्थंकर के दर्शन होते हैं (पृष्ठ २४) एक अविवेकमति भवत लिखता है । "अनन्त तीर्थकर हो गये, मगर अपने दो गुरुदेव श्री सबसे अधिक है।" पृष्ठ ४२ । प्राजकर अनेक व्यक्ति स्वयं को भगवान कहकर अपनी पूजा करवा
यदि पाठक गहराई से सोचे तो उपरोक्त बातें मोह रूपी मदिरा पीने वालों के सदृश हैं। मिथ्यात्व का प्राश्रय लेने वाला, मिथ्यात्व का प्रचार करने वाला एकांतवादी का प्रागामी भव अंधकार पूर्ण ज्ञात होता है । इस प्रसंग में महापुराण का यह कथन वस्तु स्थिति को समझने में विशेष लाभप्रद रहेगा । भगवान ऋषभदेव दशभव पूर्व महाबल नाम के राजा थे उनके ४ मंत्री थे प्रागम पक्ष का समर्थक स्वयंबद्ध मंत्री कुछ ऊच्चभव धारण कर मोक्ष गये । मिथ्यात्व का समर्थन करने वाले महामति और सभिन्नमति मंत्री द्वय निगोद में गये। शतमति मिथ्यात्व के परिपाक से नरक गया। "गत: शतमतिः श्वभ्र मिथ्यात्व परिपाकतः ।" (१०-८) इस संबंध में महाकवि जिनसेन स्वामी कहते हैं---