________________
-
६७.]
[गो. प्र. चिन्तामणि समस्यंधे निमज्जति सज्ज्ञान द्वषिणो नरा। प्राप्तापलं मतीज्ञानं बुधान्यस्येदं प्रतारतम् ॥२०८७११ सम्यग्ज्ञान के द्वेषी व्यक्ति नरक रूपी माढ़ अंधकार में निमग्न होते हैं ।
इसलिये बुद्धिमान पुरुषों को प्राप्त प्रतिपादित सम्यग्ज्ञान का सदा अभ्यास करना चाहिये । दश कोडा-कोडी सागर के अवपिसही काल में भरत क्षेत्र से अगरिणत मुनि मोक्ष गये किन्तु २४ ही आत्माओं ने तीर्थंकर प्रकृतिरूप महान पुण्य का बंधकर रत्नत्रय की समाराधना कर मोक्ष प्राप्त किया, कुन्द-कुन्द स्वामी के तीर्शकर होने का उल्लेख नहीं है। केवल मोक्ष जायेंगे। यह भी ज्ञान नहीं है। किन्तु मिथ्यात्व की मदिरा पान करने वाले पिलाने वाले मोक्ष जायेंगे और अगले भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध करेंगे । यह कथन असत्य की पराकाष्ठा हैं वे भव्य है । या अभव्य है। यह सर्वज्ञ देव ही बता सकेंगे । मिथ्या गार्ग प्रचारक राजा वसु के पतन के प्रकाश में इस समस्या का सच्चा समाधान मिलेगा।
निश्चयनय रुप पवित्र दृष्टि को धारण करने वाली प्रात्मा मोक्ष
जाती है । समयसार में कहा हैपिच्छप शयासिदा पुण मुरिगणो पावति शिवारणं ।
॥२७२३॥ निश्चयनय का माश्रय लेने वाले मुनिमरण निर्वाण प्राप्त करते हैं । निश्चयनय प्रात्मा को शुद्ध मानता है । अबद्ध मानता है। व्यवहार दृष्टि अपरमभाव वालों। के कहो है । परमभाव वाले शुक्लध्यानी निश्चय दृष्टि का अवलम्बन ले सिद्ध पदवी पाते हैं । हम कानजी पंथी निश्चनय की चर्चा करते हैं। उसका निरूपण करने वाले परम पागम रूप समयसार को पढ़ते हैं। आप भी तो निश्चयनय को हमारे समान पूज्य मानते हैं । समयसार ग्रंथ को भी ग्रंथराज स्वीकार करते हो। तब आप हमारे विरुद्ध हो हल्ला क्यों मचाते हो ?
___ यह बात पूर्ण सत्य है कि निश्चयनय की दृष्टि मोक्ष प्रद है। किन्तु यह सत्य भी आपको शिरोधार्य करना चाहिये कि निश्चय दृष्ठि के पूर्व व्यवहार नय की भी आवश्यकता है। शक्ति की अपेक्षा आप प्रात्मा को शुद्ध, प्रबद्ध कहते हैं । इसमें कोई आपत्ती नहीं है । किन्तु आप अपनी वर्तनान अशुद्ध , बद्ध संसारी गर्याय को
।
..'