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________________ अध्याय : दसवां ] [६७१ अस्वीकार करते हैं । अतः आपकी मान्यता स्याद्वाद दृष्टि से बाधित होती है। हम सबका यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि हम अल्पज्ञानी है । ज्ञान का एक अंश हमारे पास है । अज्ञान के सागर में हम डूबे हैं। हमारी शक्ति बहुत कम है। अनंत शक्ति का पता नहीं है । दुःखों से प्राक्रांत होने से यह हम कैसे कह दे कि हम सिद्ध भगवान के समान अव्याबाध अनन्त सुख भोगते हैं ? सर्वज्ञोक्त मागम पर विश्वास कर हम यह मानते हैं कि यदि हमारे ४ धातिया कर्मों का क्षय कर दिया तो हम अनंत ज्ञानी आदि बन सकते है। अभी अनंत ज्ञानी महीं हैं शक्ति और व्यक्ति अर्थात् शक्ति का व्यक्त हो जाना इसमें अंतर है। आगम में कहा है सिद्ध भगवान के लोक के अग्रभाग में सिद्ध शिला के ऊपर विराजमान है। यदि हम संसार पर्याय सहित न होते, तो हम भी सिद्धों के समीप अशरीरी होकर निवास करते है प्रागम सच्चे ज्ञान का केन्द्र है। वह जीव को संसारी और मुक्त दो प्रकार का मानता है। निश्चय दृष्टि संसार की बद्ध दशा का मुख्यता से निरुपण करती है । नियमसार में कुन्द-कुन्द स्वामी ने कहा है----- सम्वे सिद्ध महावा सुद्धरण्या संसिदी जोया। शुद्ध नय से सभी संसारी जीव सिद्ध स्वरूप हैं । व्यवहार नय की अपेक्षा जीव शुद्ध तथा अशुद्ध दो प्रकार के माने गये हैं । एकांत पक्ष सत्य शासन के विपरीत होता है और स्यावाद विरोधी है । यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि और है कि संसारी जीव शरीर युक्त है। मुक्त जीव शरीर रहित है । पंचास्तिकाय में कुन्द-कुन्द स्वामो यह भी कहते है । जीवा संसारत्था णिवादा चेदरणप्परगा दुबिहा ।। उवयोग वि य ही देहप्पवीचारा ॥२०७॥ .. जीव दो प्रकार के हैं-एक संसारी, दुसरा सिद्ध । दोनों चैतन्य रूप हैं, उपयोग अर्थात् मानोपयोग, दर्शनोपयोग सहित है। देह सहित संसारी हैं। देह रहित . . . Edigit..... टीकाकार अमृतचन्द्र सूरि ने लिखा हैजीवाः हि द्विविधाः संसारस्था अशुद्ध निबंताः शुद्धाश्च । कानजी पंथी कथन अनेकांत दृष्टि का प्रतिनिधित्व नहीं करने से सत्यशासन
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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