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________________ ६७२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि के विपरीत हो जाता है। वह स्याद्वाद विरोधी है । समन्वय दृष्टि से पूर्ण सत्य का परिज्ञान होता है । बुद्ध ने वस्तु को अनित्य माना है । यह सत्यांश है । वह वस्तु के नित्य पक्ष को अस्वीकार करता है । इससे वह सत्य कथन भी असत्य हो जाता है । इसी प्रकार कानजी पंथ में व्यवहार को सर्वथा मिथ्या मानकर निश्चय पक्ष को ही मान्यता दी जाती है। इससे वह कथन स्याद्वाद विद्या के प्रकाश में असत्य हो जाता है । __ मनुष्य के दो नेत्र होते हैं। सीधी आँख फूटी हो तो वह काना है । बाई प्रांख फूटी हो तो वह भी काना होगा। जो नय व्यवहार पक्ष को ही सत्य मानकर निश्चय पक्ष को अस्वीकार करेगा, वह मिथ्यात्वी है । इसी प्रकार जो निश्चय को सत्य मान कर व्यवहारनय को मिथ्या मानेगा, वह भी मिथ्यात्वी है। एकांत निश्चय को पकड़कर हम मोक्ष से दूर हो जायेंगे। कुन्द-कुन्द स्वामी की यह बात ध्यान देने योग्य है कि निश्चयनय भगवान को सर्वज्ञ नहीं मानता और यदि व्यवहारनय का कथन मिथ्या है तो सर्वश का लोप हो जायेगा तथा सम्पूर्ण जिनागम प्राप्त दारणी नहीं रहेगा । जारादि पस्सति सव्वं वबहारणयेग केवली भसवं। केवलवाणी जाणदि पस्सदि पियमेण अप्पारणं ॥२०॥ नियमसार--१७० केवली भगवान व्यवहारनय से सर्व पदार्थों को जानते हैं देखते हैं किन्तु निश्चयनय से केवली भगवान अपनी आत्मा को देखते हैं। इस प्रकार निश्चयनय सर्वज्ञ को अस्वीकार करता है। स्थाद्वाद दृष्टि दोनों कथन सत्य हैं केवली भगवान सर्वज्ञ हैं। प्रात्मज्ञ भी हैं । एकांतवादी के द्वारा समस्या उलझ जाती है । विशेष बात :--यह बात ध्यान देने योग्य है। नियमसार में कहा है निश्चय दृष्टि से पुद्गल का परमाणु शुद्ध द्रश्य है ! उस दृष्टि में स्कन्ध का कोई स्थान नहीं है। व्यवहार की दृष्टि से स्कन्ध का सद्भाव माना गया है। यदि व्यवहार दृष्टि को अप्रमाण तथा झूठा माना जाय तो शून्यवाद प्रा जायेगा, कारण निश्चय दृष्टि से स्कंध का अभाव है और स्कन्ध का अभाव मानने पर उसके कारण रूप परमाणु का भी प्रभाव हो जायेगा: अतः सर्व झंझटों से बचने के लिए दोनों नयों की वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिये। H Karki Hard
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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