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अध्याय : ग्यारहवां]
[१००७ वर्तमान हम देव एवं पुरुषार्थ का वैभव एवं शक्ति का पर्यालोचन करेंगे जिनों का साम्राज्य संसार एवं मोक्ष है।
यत्प्राग्जन्मनि संचितं तनुभृता कर्माशुभं वा शुभं, तवं सददीरमादनभवन वखं सखं वागतम. कुर्याधः शुभमेष: सोऽप्यभिमतो घस्तूभयोपिछत्तये; सर्वारम्भ में परिग्रह ग्रहपरित्यागी स वन्द्यः सताम् ॥२१२।।
जीव ने पूर्वभव में जिस पाप या पुण्य कर्म का संचय किया, वह देव है। बह देव दो प्रकार का है (१) पाप देव (२) पुण्य दैव ! इन दोनों देव का सृष्टि करने वाला जो कर्ता है वह यथाक्रम (१) असत् पुरुषार्थ (२) शुभ पुरुषार्थ शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य | Virtuous activity is the cause of merit (Punya) and wicked activity is the cause of demerit (Papa) उसकी उदीरणा से अर्थात् पाप देव एवं पुण्य देव का शासन काल में दोनों देव को अनुभव करता हुआ, जो.बुद्धिमान शुभ को ही करता है अर्थात शुभ पुरुषार्थ को करता है, पाप पुरुषार्थ का त्याग करता है वह ही प्रशंसा योग्य है। किन्तु जो (३) परम पुरुषार्थी दोनों देव को ही नष्ट करने के लिये समस्त दैव का (अनुग्रह एवं कृतज्ञता (प्रारम्भ व परिग्रह) रूपी पराधीनता को त्याग करके परमपुरुषार्थ रूप स्वाधीन स्वराज्य में रमण करता है वह तो सबन पुरुषों के लिये बन्दनीय है।
___ यह महा पराक्रमी धूर्त, मूर्ख (जड़) दैव विभिन्न राज्य में विभिन्न नाम धारण करके पुरुषों के ऊपर शासन करता है।
विधि स्रष्टा विधाता च देवं कर्म पुराकृतम् । ईश्वरश्चेति पर्याया विज्ञेया कर्मवेधसः ॥२१२६॥
विधिः, सृष्टा, विधाता, देव, कर्म, पुराकृतम्, ईश्वर, कर्म आदि अनेक नामों को धारण करने वाला यह जड देव है । यह देव है । यह देव मुर्ख (जड) होकर भी संसार में एक जगाधिप शासन करने की शक्ति प्रशिक्षित, आलसी पुरुषार्थ विमुख पुरुषों से प्राप्त हुआ।
जीव परिणामहेदु कम्मत्तं पुग्गल परिमति । पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेब जीवो वि परिगमः । स. सा६०।
Material molecules are trans formed in to Karmas by reason of the mündárie soul's thought-activity; Similarly the mundane soul-is trans
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