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________________ अध्याय : नौवां । [ ७७७ .. २. प्रथम भद्रबाहु अन्तिम श्रुतकेवली हो गये हैं। द्वितीय भद्रबाहु अन्तिम निमित्त ज्ञानी हुए हैं। ३. सुपार्श्ववन्द नामा अन्तिम चारणमुनि हो गये हैं। ४. प्रज्ञाश्रमलों में वजयश नामा अन्तिम श्रमण हो गये हैं। ५, श्रुत नाम के मुनि अन्तिम श्रमण हो गये हैं। विनय एवं सुशीलादि गुणसंपन्न श्री नाम के ऋषि हो गये हैं। मुकुटधारी राजाओं में जिन दीक्षा धारण करने वाले सम्राट चन्द्रगुप्त अन्तिम राजा हुए हैं। इनके पश्चात् कोई भी मुकुट धारी राजागरण जिन दीक्षा नहीं धारण करेंगे। आगामी काल में कौन-कौन के जीव तीर्थंकर होंगे ? इस विषय में कई जगह कोई छोटी मोटी पुस्तक में और नाम देखने में प्राये हैं। अट्टहरि राव पडिहरि चलक्कि घउक्को य एय बचलहो । सेरिणय समंतभद्दो तित्थय राहु तिमियमेव ॥१६०७॥ प्रथम तो यह गाथा ठीक नहीं और कौन से शास्त्र की है, इसका भी पता नहीं और इसका अर्थ भी ठीक नहीं जमता है। कारण 'त्रिपिष्ट' नाम का पहिला नारायण (हरि) का जीव श्री वर्धमान तीर्थंकर होकर मुक्त हुआ है। (देखो उत्तरपुराण पर्व ७४) और ८वा नारायण हरि लक्ष्मण का जीव आगे पुष्कराध द्वीप के विदेह क्षेत्र में जन्म लेने वाला है, ऐसा पद्मपुराण पर्व १०६ में लिखा है। इन दोनों नारायणों को घटाने से सात ही नारायण रह जाते हैं, परन्तु गाथा में 'अट्टहरि' लिखा है । और 'अश्वनीच' नाम का पहला प्रति नारायण (पडिहरि) का जीव इन प्रतिनारायणों में 'मृगध्वज' नाम का केवली होकर मुक्त हो चुका है। तब नव प्रतिनारायण कैसे संभव हैं ? और भी आदि अंत के चौबीस होनहार जीव अन्त के रुद्र पर्यंत चौथे काल में ही हो चुके हैं. फिर पांचवें काल में हुये समन्तभद्र · महाराज का जीव इन चौबिस में आना कैसे संभव है ? और समंतभद्र महाराज तीर्थंकर प्रकृति का बंध कब किये थे ? और भी अनेक युक्ति प्रयुक्ति से इस गाथा में कथित अर्थ नहीं जमता है । इसलिये तिलोयपणाति और उत्तरपुराण के कथनानुसार अर्थ का श्रद्धान करना चाहिये । इस विषय को पाठक समझ लें।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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