SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 867
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ । RSHAD ७७८ ] [ गा. प्र. चिन्तामरिण भूतकाल के तीर्थंकरों के नाम-१. निर्वाण, २. सागर, ३. महासाधु, ४. विमलप्रभ, ५. श्रीधर, ६. सुदत्त, ७. अमलप्रभ, ८. उध्दर, ६. अंगिर, १०. सन्मति, ११. सिन्धु, १२. कुसुमौजली, १३. शिवगरण, १४. उत्साह, १५. ज्ञानेश्वर, १६. परमेश्वर, १७. विमलेश्वर, १८. यशोधर, १६. कृष्णमति २०. ज्ञानमति, २१. शुध्दमति, २२. श्रीभद्र, २३. अतिकांत, २४. शान्त ।। जघन्येन जिनाधोशा भवन्ति विशतिप्रमाः । चक्राधिपाश्च सर्वत्र नदेवखचराचिताः ॥१६०८।। अर्थात् अढाई द्वीप में तीर्थकरों की जघन्य संख्या बीस रहती है, इनके सिवाय देव, मनुष्य और विद्याधरों से पुज्य ऐसे चक्रवर्ती भी होते हैं । कौन से क्षेत्र की अपेक्षा कितने चक्रवर्ती कहे गये हैं.-- इन भरत और ऐरावत खंडों में कालानुसार एक-एक चक्रवर्ती होते रहते हैं । सना क्षेत्र में निवार्य खंट और पांच मलेच्छ खंड मिलकर ६ खंड होते हैं। उसी प्रकार ऐरावत क्षेत्र में भी छह खंड होते हैं। विदेह क्षेत्र में जो ३२ देश हैं, उन देशों में भरत क्षेत्र के समान छह-छह खंड होते हैं और उन देशों में एकएक चक्रवर्ती होते रहते हैं । मंच विदेह क्षेत्र की अपेक्षा एक समय में १६० तीर्थकर, सकल चक्रवर्ती तथा अर्ध चक्रवर्ती कहे गए हैं। पांच भरत तथा पाँच ऐरावत क्षेत्रों की अपेक्षा इनकी उत्कृष्ट संख्या १७० होती है। जघन्य से विदेहों की अपेक्षा कम से कम संख्या तीर्थंकरों, चक्रवतियों तथा अर्ध चक्रवर्तियों की बीस कही गई है। त्रिलोकसार में लिखा है तित्थद्ध-सयल चक्की सद्विसयं पुखरेमध्यवरेण । बीसं बोसं सयले खेले ससरिसय बरदो ॥१६०६।। चक्रवतियों की संख्या जो १२ कही है, वह भरत और ऐरावत क्षेत्रों की अपेक्षा से कही गई है । विदेह क्षेत्र में वे प्रायः सर्वत्र होते रहते हैं, वहां उत्कृष्ट' या जधन्य संख्या का नियम नहीं है । - चक्रवर्ती पद-नरक में से पाने वाले जीवों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता है, स्वर्ग से आने वाले जीवों को ही यह चक्रवर्ती पद प्राप्त होता है-ऐसा नियम है। :
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy