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________________ ......: Bा ११० ] [ गो. प्र. चिन्तामरिणं पीरिण, प्रमत्ता प्रमत्ता प्रमत्तयोस्तदा ज्ञाननिर्वाणे द्वे प्राग्भवे तदा गर्भावतारादीनि पंचेत्यबसेयं (पृ० ७०८) अर्थात् चरमंशरीरी असंयत द्वारा जन्म तीर्थंकर प्रकृति के बंध का प्रारम्भ होता है, तब उनके तप, ज्ञान तथा निर्धारण ये तीन कल्याणक होते हैं । प्रमत्त गुणस्थान वाले चरम शरीरी व्यक्तियों द्वारा जब तीर्थकर प्रकृति का बंध प्रारम्भ किया जाता है । तब उनके ज्ञान कल्याणक तथा मोक्ष कल्याणक, ये दो होते हैं । जब पूर्व भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया जाता है, तो पांचों कल्याणक होते है। भरत तथा ऐराक्त में पंच कल्याणक वाले ही तीर्थंकर होते हैं । उपरोक्त शास्त्राधार से यह बात निराबाध सिद्ध होती है। जिन तीर्थंकरों के तीन या दो कल्याणक होते हैं, उनके दस जन्मातिशय होंगे या नहीं, यह विचारणीय बात है। तर्क की दृष्टि से उनके अहंत अवस्था में ३६ गुरा मानना होगा। यदि इसके विरोध में पागम की वाणी मिले तो तदनुसार ही श्रद्धा करना उचित है। सामान्य केवली के भी ३६ गुण मानना ठीक जंचता है। हमें स्पष्ट रूप से प्रागम का आधार नहीं मिला। विदेह क्षेत्र में मोक्ष के योग्य संहननादि समुचित सामग्री की सदा उपलब्धि होने से वहां मोक्ष का मार्ग सतत चलता रहता है । अतएव मुमुक्षु मानव में ऐसी इच्छा का उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि इस दुषमा काल की कीडा भूमि में पाप प्रचुर पंचम काल युक्त भरत क्षेत्र से निकलकर तीर्थकर केवली आदि के बिहार से पुनीत विदेह में जाकर यह जीव आत्मा का कल्याण करे। इसका क्या उपाय है ? यदि सम्यक्त्व की उपलब्धि हेतु है. तो बात बड़ी कठिन है, कारण सम्यक्त्व की चर्चा चाहे जितनी की जाय और जो चाहे करे, उस सम्यक्त्व रत्ल के स्वामी उस क्षेत्र में दो चार अर्थात् अंगुलियों पर गिनने लायक कहे गये हैं। समाधान :- उक्त शंका का निराकरण इस गाथा द्वारा होता है, जो बताती है, कि इस काल में भरत क्षेत्र से १२३ भद्रं परिणाम वाले यहां से पूर्व विदेह में जावेंगे, और नौमे वर्ष में केवलज्ञान को प्राप्त करके केवली भगवान होंगे । सिद्धान्त सार की वह गाथा इस प्रकार है : जीवा सय तेईसा पंचमकाले य भष्परिणामा । उपाइ पुष्यविवेहे नवमइयरसे दु केवली होदि ।।१६३३१६ TAITRAM S .: ..::
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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