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अध्याय : दसवां ] प्रश्न :-तनु च भरतैरावतयोरपि विदेहाः ? ऐसी स्थिति में भरत और
ऐरावत भी विदेह कहे जायेंगे, क्योंकि वहां से सिद्ध पर प्राप्त
होता है। उत्तर :--- 'सत्यं संति कदाचिनतु सर्व कालं, तर तु सततं धर्मोच्छेदाभावाद् विदेहाः संति, प्रकर्षापेक्षोविदेहव्यपदेशः ।
ठीक है भरत ऐरावत से सर्वकाल मोक्ष नहीं होता है। किन्तु दुखमा मुखमा काल में ही विदेहता होती है । विदेह क्षेत्र में कभी भी धर्म का उच्छेद नहीं होता है, अतः अधिकता की अपेक्षा उस क्षेत्र को विदेह कहा गया है ।
विदेह क्षेत्र के तीर्थंकर केवलियों के कल्याणक :
पूर्व पश्चिम दोनों विदेह क्षेत्रों में अर्थात् पंच मेरु सम्बन्धी १६० विदेह क्षेत्रों में होने वाले तीर्थंकरों के लिए ऐसा नियम नहीं है कि जैसा भरत और ऐरावत क्षेत्र के तीर्थकर पंचकल्याणक वाले होते हैं, वहां तीर्थकर प्रकृति का बंध करने वाला व्यक्ति यदि चरम शरीरी हो अर्थात् उसी भव से मोक्ष प्राप्त करने वाला हो और गृहस्थ अवस्था में रहते हुए उसने तीर्थकर प्रकृति का बंध कर लिया हो तो उसके तीन कल्यारक (तप, शान और मोक्ष) होते हैं। और जिसने मुनि होकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया हो तो उसके दो कल्याणक (ज्ञान और मोक्ष) होते हैं। यदि वह चरम शरीरी नहीं होगा अर्थात् जिसने पहले भव में तीर्थकर प्रकृति का बंध किया है, तो वह गर्भ जन्मादि पंच कल्याणकों का स्वामी होगा। यहाँ दोनों प्रकार के महापुरुष होते हैं । किन्हीं के पांचों कल्याणक होते हैं और किन्हीं के कम भी
होते हैं।
त्रिलोकसार में लिखा है कि विदेह क्षेत्र में सदा केवली भगवान, शलाका पुरुष, ऋद्धिधारी मुनीश्वरों की विपुल संख्या पायी जाती है, इससे वहां दुभिक्ष, ईति, भौति, कुदेव तथा मिथ्यालिंगी और उनके पूजक मिथ्यामतियों का प्रभाव रहता है । उक्तं च :--
देसा दुभिक्खोदी-मारि-कुदेव वलिगिमवहीरणा । भरिदा सदावि केवलि-सलाम-पुरिसिद्धि-साहूहि ॥१६३२॥ ,
गोम्मटसार कर्मकांड गाथा ५०६ की जीव प्रबोधिनी संस्कृत टीका में लिखा है, 'तीर्थबंधप्रारंभश्चर मांगासंयत देशसंयतयोस्तदा कल्याणानि निष्क्रमणादीनि