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अध्याय : दसवां ]
यहां से विदेह जाने वाले जीव के सम्यक्त्व का अभाव आवश्यक है । यदि सम्यक्त्वी जीव है, तो वह मरणकर देव पर्याय को प्राप्त करेजा, कारण यहां नरकायु की बंधव्युच्छिति प्रथम गुणस्थान में होती है। सासादन गुणस्थान में तिर्यंचायु के साथ मनुष्यायु की बंधव्युच्छित्ति हो जाने से अविरत सम्यक्त्वी जीव देवायु का ही यहां से बंध करेगा। गोम्मटसार कर्मकांड की गाथा ११० तथा १०८ में बताया है कि मनुष्यों तथा तिर्यंचों के वनवृषमनाराच सहनन प्रादीरिक शरीरं प्रौदारिक श्रांगोपांग मनुष्यायु, मनुष्यगति तथा मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन छह प्रकृतियों की बंधव्युच्छिति चौथे गुणस्थान के बदले दूसरे गुरणस्थान में होती है । कहा भी है :
उरिम छहं च छिदी सासरगसम्मे हये रिणयमा ।।
ऐसी स्थिति में सम्यक्त्वी मनुष्य आगामी देवायु का बंध करेगा । विदेह में जाने वाला मनुष्य सम्यक्त्व सहित मरण नहीं करेगा। ऐसी कर्म सिद्धान्त की व्यवस्था होने से धार्मिक व्यक्तियों के मन में भक्ति, प्रत, संयम की ओर विशेष अनुराग उत्पन्न होना चाहिये। कारण यह किसे मालूम है कि भरत से विदेह जाने वाले भद्र परिणामी १२३ जीवों में किसको स्थान प्राप्त होता है। तत्व की बात यह है कि काल की कलुषता का आश्रय लेकर अकर्मण्यता को नहीं अपनाना चाहिये तथा विषयों का दास न बनकर प्रात्मकल्याण के लिए बुद्धि तथा विवेक पूर्वक उद्योग करते रहना चाहिये । पुरुषार्थी नररल ही जयश्री को वरण करते हैं । प्रमादी का भविष्य सदा अंधकार में रहता है।
इस गाथा के भाव को स्मरण रखते हुए विचारवान मानव को प्रात्म हितार्थ उद्योग करना चाहिये । इसी से क्षपकराज प्राचार्य शांतिसागर महाराज ने अपनी मंगलवारणी में कहा था, वत्स! डरो मत-'बाबलो भीऊ नका ।'
वर्तमान के विदेह क्षेत्रस्थ विशति तीर्थंकरों के नाम चिन्हादि :--
नं. तीर्थंकरों के नाम चिन्ह पिता का नाम माता का नाम नगरी के नाम
१. सीमन्धर २. युगमन्धर ३. बाहु
वृषभ श्रेयांस हाथी मुदृढ़रथ मृग सुग्रीव
सत्यदेवी पुंडरीकिरणी · सुतारा सुसीमा विजया अयोध्या