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अध्याय : पाँचवां ]
[ ३९१ १. सामायिक----गृहस्थ वा मुनि जो नियत काल तक अथवा अनियत काल तक समता धारण करते हैं, उसको सामायिक कहते हैं । उनका जिसमें वर्णन हो वह सामायिक प्रकीर्णक है।
२. चतुर्विशतिस्तक-- वृषभादि चौबीस तीर्थंकरों के आठ प्रतिहार्य चौतीस अतिशघ, चिन्ह तथा अनंत चतुष्टय आदि की स्तुति करना स्तब है। उसका जिसमें वर्णरण हो वह चतुर्विशति स्तव है ।
३. वंदना-पंच परमेष्ठियों में से प्रत्येक की अलग अलग वंदना करना वंदना है । उसका जिसमें वर्णन हो वह वंदना है !
४. प्रतिक्रमण--जिसमें सात प्रकार के प्रतिक्रमण का वर्णन हो उसको प्रतिक्रमण कहते हैं । यथा (१) देवसिक-जिनके दोषों को निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण । (२) रात्रिक-रात्रि के दोषों का निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण (३) पाक्षिकपद्रह दिन के दोषों के निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण (४) चातुमासिक प्रतिक्रमण--जिसमें चार महीने के दोषों का निराकरण हो। (५) सांवत्सरिक प्रतिक्रमरण-जिसमें एक वर्ष के दोषों का निराकरण हो। (६) ऐपिथिक-जिसमें ईपिथ संबंधी दोषों का निराकरण । (७) उत्तमार्थिक जिसमें समस्त पर्याय संबंधी दोषों का निराकरण किया जाय । इस प्रकार सात प्रकार के प्रतिक्रमणों का वर्णन जिसमें हो उसको प्रतिक्रमण प्रकीर्णक कहते हैं।
५. धनयिक-जिसमें ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, तप विनय और उपचार विनयों का वर्णन हो उसको वैनयिक प्रकिर्णक कहते हैं।
६. कृति कर्म-जिसमें दीक्षा देने और दीक्षा लेने का विधान हो उसको कृति कर्म कहते हैं।
७. यश बैंकालिक-द्रम, पुष्पिल आदि दश दश अधिकारों के द्वारा इसमें मुनियों के समस्त आचरणों का वर्णन है ।
८. उत्तराध्ययन-इसमें अनेक प्रकार के उपसर्ग सहन करने और उनको सहन करने के फलों का वर्णन है ।
६. कल्पाकल्प---इसमें मुनियों के योग्य आचरणों का तथा उन आचरणों से च्युत होने पर योग्य प्रायश्चित का वर्णन है।
१०. कल्पाकल्प- इसमें गृहस्थ और मुनियों के योग्य आचरणों का वर्णन
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