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________________ HITEHSISTाठापनाउRARIA ३६० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि अाठ अक्षर वा इससे अधिक अक्षरों के समुदाय को प्रमाण पद कहते हैं । इससे अलबाह्य श्रत की संख्या कहीं जा सकती है। जैसे अनुष्टुप श्लोक के प्रत्येक चरण में पाठ अक्षर होते हैं। अंग प्रविष्ट श्रुत की संख्या के निरूपगा करने वाले जो पद हैं उमको मध्यम पद कहते हैं । इस श्लोक में उन्ही मध्यम पद के अक्षरों की संख्या का प्रमाण कहते हैं । सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख, अठत्तर सौ अठासी अक्षर अर्थात् सोलह अरब चौंतीस करोड़, तिरासी लाख, सात हजार, पाठ सौ अठासी अक्षर एक-एक मध्यम पद के होते हैं। समस्त श्रु तज्ञान के अक्षरों की संख्या इकट्ठी प्रमाण है- अर्थात् १८४४६७४४०७३७०६५५१६१६ इतने अक्षर हैं। इसमे मध्य पद के अक्षरो का शाग देना चाहिए जो फल प्राये वह द्वादशांग की पद संख्या समझनी चाहिये । तथा जो अक्षर बाकी रहते हैं, वे अक्षर अङ्गबाह्य श्रु त ज्ञान के समझने चाहिये । जो अक्षर बाकी रह जाते हैं उनसे मध्यपद बन नहीं सकता इसीलिये वे अक्षर अंग बाह्य के समके जाते हैं। उनकी संख्या आठ करोड़, एक लाख, पाठ हजार, एक सौ पिचहत्तर हैं। उस अंग बाह्य के अनेक भेद हैं उन्हीं की स्तुति करते हैं :अङ्गाबाह्य के अनेक मेदों का स्वरूप--- सामायिक चतुर्विशति, स्तवं वंदना प्रतिक्रमणं । वैनयिक कृति कर्म च, पृथुदशवकालिकं च तथा 16001 वरमुत्तराध्ययनमपि, कल्प व्यवहारमेवमभिवंदे । कल्पाकल्पं स्तौमि, महाकल्पं पुडरीकं च ॥६०१॥ परिपाटया प्रणिपतितोऽस्यहं महापुडरोकतामय ।। निपुरणान्य शीतिक च, प्रकीर्णकान्यंग बाह्यानि ॥६०२॥ अंग बाह्य श्रुत झान के चौदह भेद हैं, उनके नाम ये हैं--१. सामायिक २. चतुर्विशति स्तवं, ३. वंदना, ४. प्रतिक्रमण; ५. वैनयिक, ६. कृति-कर्म, ७. देशवैकालिक, ८. उत्तराध्ययन, ६. कल्प व्यवहार, १०. कल्पाकल्प, ११. महाकल्प, १२. पुडरीक, १३. महापुडरीक, १४. अशीतिक इन्हीं को प्रकीर्णक कहते हैं । इनमें । पदार्थों का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म रीति से वर्णन किया है। ऐसे इन चौदह प्रकीर्णकों को मैं बड़ी विनय के साथ वंदना करता हूँ। Sha MamtaAHame POSMANABARADARTHA N NERATION
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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