________________
अध्याय : पांचवां
पंचमदस्तु चतुर्थ, प्राधृतकस्यानुयोग नामामि । कृतिवेदने सथैव, स्पर्शन कर्म प्रकृति मेव ॥१६॥ बंधन निबंधन प्र, क्रमानुपक्रम मथाभ्युदयमोक्षौ । संक्रमलेश्ये च तथा, लेश्यायाः कर्म परिणामौ ॥८६५। सातम सातं दीर्घ, हस्वअवधारसीय संजं च । पुरु पुद्गलात्म नाम च, निधत्तनिधत्तमभि नौमि 1८६|| सनिकाचित मनिकाचिस, मथ कर्मस्थितिक पश्चिमस्कंधौ । अल्प बहुत्वं च यजे, सवाराणां चतुर्विशम् ॥७॥
१. कृति, २. वेदना, ३. स्पर्शन, ४. कर्म, ५. प्रकृति, ६. बन्धन, ७. प्रक्कम, ८. अनुपक्रम, ६. अभ्युदय, १०. मोक्ष, ११ संक्रम, १२. द्रा लेरा, १२. भानग्या , १४. सात, १५. मसात, १६. दीर्घ, १७. ह्रस्व, १८. भवधारणीय, १६. पुरु पुद्गलात्म, २०. निधत्तमनिधत्त, २१. सनिकांचित मनिकांचित, २२. कर्म स्थितिक, २३. पश्चिम स्कंध, २४, अल्प बहुत्व ये चौबीस अनुयोग हैं ये चौबीसों अनुयोग अथवा पञ्चीस अनुयोग प्राग्रायरणीय पूर्व के पांचवे च्यवन लब्धि नाम के अधिकार के कर्म प्रकृति नामक चौथे प्राभूत कहे जाते हैं । इनको मैं भक्ति पूर्वक नसस्कार करता हूं। द्वादशांग श्रुत ज्ञाम को पद संख्या
कोटीनां द्वादशशत, मण्टापंचाशतं सहस्त्राणाम् । लक्षय शोतिमेवच, पंच च वंदे अत पदानि
इस प्रकार समस्त द्वादशांग की पद संख्या एक सौ बारह करोड़, तीरासी लाख, अठ्ठावन हजार पांच है । इस श्रु त ज्ञान को मैं सदा नमस्कार करता हूँ। मागे एक एक पद में कितने कितने अक्षर होते हैं....
षोडश शतं चतुस्त्रिशत, कोटोनां त्र्यशीति लक्षारिए । . शतसंख्याष्टा सप्तति, मष्टाशीति च पदवरान् ॥६६
पद तीन प्रकार के होते हैं । १. अर्थ पद, २. प्रमार' पद, ३. मध्यम पद । कहने वाले का अभिप्राय जित्तने अक्षरों से पूर्ण हो जाय उतने अक्षरों का एक अर्थ पद होता है । इस पद के अक्षर नियत नहीं है । किसी पद में अधिक अक्षर होते हैं और किसी में कम । जैसे 'अग्नि लाओ इसमें थोड़े अक्षर हैं और 'सफेद गाय को अपनी जगह पर बांध दो" इसमें अधिक अक्षर हैं।