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३८८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि ऊपर जो उत्पादपूर्व प्रादि चौदह पूर्व कहे हैं उनमें नीचे लिखे अनुसार अधिकार हैं । उत्पाद पर्व के दश अधिकार हैं । प्राग्रायणीय के चौदह, वीर्यातुवाद के आठ, अस्ति नास्ति प्रवाद के अठारह, ज्ञान प्रवाद के बारह, सत्य प्रवाद के बारह, आत्म प्रवाद के सोलह, कर्म प्रवाद के बीस, प्रत्याख्यान पूर्व के तीस, विद्यानुवाद के पन्द्रह, कल्याणवाद के दश, प्राणानुवाद के दश, क्रिया विशाल के दश और लोक बिंदुसार के दश अधिकार हैं।
वस्तूनि दश दशान्येष्वनुपूर्व भाषितानि पूर्वाणाम् । प्रतिवस्तु प्राभृतकानि, विशति विशति नौमि IC६१॥
ये सब मिलकर एक सौ पिचानवे अधिकार होते हैं । इन सब अधिकारों को वस्तु कहते हैं । एक-एक वस्तु वा अधिकार में बीस-बीस प्राभूत होते हैं इस प्रकार एक सौ पिचानवे अधिकारों में उन्तालीस सौ प्राभूत होते हैं । तथा एक-एक प्राभृत में चौबीस प्राभूत-प्राभूत होते हैं सब प्राभूत प्राभूतों की संख्या तिरानवे हजार छ: सौ होती है । .
.. पूर्व १४, वस्तु १६५, प्राभूत ३६००, प्राभूत प्राभूत ६३६०० होते हैं। इन सबको मैं भक्ति पूर्वक नमस्कार करता हूँ।
___ आगे आनायणीय पूर्व के चौदह अधिकार अथवा वस्तु कही जाती हैं उनके नाम पूर्व परम्परा से उपलब्ध हो रहे हैं । इसलिये प्राचार्य उनका वर्णन करते हैं ।
पूर्वातं ह्यपरान्त, घ्र बमध्र बच्यवन लब्धि नामानि । अघ्र व वसंप्ररिपरिणधि चा, प्वर्थ भौमाययाधं च ॥८६॥ सवार्थ कल्पनायं, ज्ञानमतीतं स्वनागलं कालं ।' सिद्धिमुपाध्यं च तथा, चतुर्दश वस्तूनि द्वितीयस्य ॥१३॥
इस दूसरे प्राणायगीय नाम के पूर्व के चौदह अधिकार हैं, उनके नाम ये हैं--- पूर्वान्त, अपरान्स, प्रक, अधव, च्यवनलब्धि, अध्र व संप्रणिधि, अर्थ भौमावय, सर्वार्थ कल्पनीय, ज्ञान, अतीत काल, अनागत काल, सिद्धि और उपाध्य' । ये नाम प्राचार्य परम्परा से चले आ रहे हैं । इनको भी मैं नमस्कार करता हूँ।
___ आगे इस प्राग्रायणीय पूर्व के चौदह अधिकारों में से पांचवां अधिकार च्यवनलब्धि' है उसके चौथे अध्याय का नाम 'कर्म प्रकृति' है, उसके चौबीस अनुपयोग हैं, उनके नाम प्राचार्य परम्परा से चले पा रहे हैं प्राये उन्हीं की स्तुति करते हैं।
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