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अध्याय : पांचवा ]
[ ३८७ ६, सस्य प्रकाद-इसमें वचन गुप्ति का वर्णन है, वचनों का संस्कार किस प्रकार होता है उसका वर्णन है, कंठ, तालु आदि उच्चारण स्थानों का वर्णन है, जिनके बोलने की शक्ति उत्पन्न हो गई है ऐसे दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय जीवों के शुभ, अशुभ वचनों के प्रयोगों का वर्णन है। इसकी पद संख्या एक करोड़
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७. प्रात्म प्रवाद ---इसमें जीव के ज्ञान, सुख और कृतत्व आदि धर्मों का वर्णन है । इसकी पद संख्या छब्बीस करोड़ हैं। .
८. कर्म प्रवाव-इसमें कर्मों का बध, उदय, उदीरणा, उपशम और निर्जरा आदि का वर्णन है। इसकी पद संख्या एक करोड़ अस्सी लाख है।
६. प्रत्याख्यान पूर्व – इसमें द्रव्य और पर्यायों के त्याग का वर्णन है । उपवास करना, प्रत, समिति, गुप्ति, पालन करना, प्रतिक्रमण, प्रतिलेख, विराधना विशुद्धि आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या चौरासी लाख है।
१०. विद्यानुवाद--इसमें सात सौ लधु विद्या, पांच सौ महाविद्यानों का वर्णन है। पाठों महानिमित्तों का वर्णन है तथा इन सब विद्याओं का साधन का वर्णन है । इसकी पद संख्या एक करोड़ दस लाख है।
११. कल्याणवाद----इसमें तीर्थकर परमदेव चक्रवर्ती बलदेव नारायण प्रादि के गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक सादि का वर्णन है। इसकी पद संख्या छब्बीस करोड़ है।
१२. प्रारगानुवाथ-इसमें प्रारण, अपान के विभाग का वर्णन है, आयुर्वेद शास्त्र, मंत्र शास्त्र, गारुडीविद्या आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या तेरह करोड़ है। .
१३. किया विशाल----इसमें बहत्तर कलाओं का वर्णन है तथा छंद शास्त्र और अलंकार शास्त्र का वर्णन है । इसकी पद संख्या नौ करोड़ है।
१४. लोक बिन्दुसरर-इसमें लोक में सबसे प्रधान और सार भूत जो मोक्ष है उसके सुख, साधन और उसको करने के लिये कहे गये समस्त अनुष्ठानों का वर्णन है । इसकी पद संख्या बारह करोड़ पचास लाख है। . .
इन पूर्वो के अधिकार तथा प्रत्येक अधिकार के प्राभूत आदि का वर्णन-... दश च चतुर्दश चाष्टा, वष्टादश भ द्वयोद्विष्टकं च । षोडश च विशति च, त्रिशत मपि पंचदश च तथा ६०॥
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