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[ मो. प्र. चिन्तामणि है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा का विशेष समय के अनुसार योग्य आचरणों का निरूपण इसमें किया गया है ।
११. महाकल्प - दीक्षा, शिक्षा, गणपोषण, आत्मसंस्कार, भावना, उत्तमार्थ ये छह कालभेद माने हैं। इनके अनुसार इसमें मुनियों के आचरणों का निरूपण हैं । १२. पुण्डरोक -- इसमें भवनवासी, व्यंतर ग्रादि देवों में उत्सन्न होने के कारण तपश्चरण का वर्णन है ।
१३. महापुण्डरीक --- इसमें देव, देवांगना, अप्सरा आदि स्थानों में उत्पन्न होने के कारण का वर्णन है ।
१४. प्रशीतिक इसमें मनुष्यों की प्रायु और सामर्थ्य के अनुसार स्थूल दोष और सूक्ष्म दोषों के प्रायश्चित्तों का वर्णन है ।
इस प्रकार ये चौदह प्रकीर्णक कहलाते हैं। इनमें अत्यन्त सुक्ष्म पदार्थों का वर्णन है, इसीलिये इनको निपुण कहते हैं । ये अङ्ग बाह्य इतने ही हैं । न इनसे कम हैं और न इनसे अधिक हैं, ऐसे इस अंग बाह्य को मैं नमस्कार करता हूँ। इस प्रकार श्रुतज्ञान के पाठी उपाध्याय परमेष्ठि होते हैं ।
(भक्ति, ग्रा. पूज्यपाद कृत )
महोपवासादिक का अनुष्ठान करने वाले तपस्वी कहलाते हैं, ये १० प्रकार के
सपस्वी का लक्षण ----
होते हैं ।
शैक्ष्य --
ग्लान-
गण
कुल ---
संघ --
जो निरंतर शिक्षाशील रहते हैं, उन्हें शैक्ष्य कहते हैं 1.
रोग आदि से क्लान्त शरीर वालों को ग्लान कहते हैं ।
स्थविरों की संतति को गरम कहते हैं ।
दीक्षाचार्य के शिष्य समुदाय को कुल कहते हैं ।
चार वर्ण के श्रमणों को संघ कहते हैं ।