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atharamatanABAD
गुरणस्थानों का गमनागमन-४१-४२, आठ कर्मों के स्वरूपपरक दृष्टान्त-४२-४४, कर्म .. प्रकृतियों का बंध-उदय हो पा गुणस्थान-- ४४-४७, चौदह गुणस्थानों में मरण से होने वाला गतिबंध-४७-४८, चौदह गुरणस्थानों में कर्मों का प्राश्रय, श्रायुबंध और उदय४८-४६, गुणस्थानों की अपेक्षा लेश्याओं का : स्वरूप-४६-५०, लेश्यामों से गतिप्राप्ति का स्वरूप-५२-५४, गुणस्थान का स्वरूप-भेद-: . निमित्त-५४-५६, मिथ्यात्व के भेद ब स्वरूप -५७, सांसादन-मिश्र-अविरत गुरंगस्थान
स्वरूप-५७-५८.] (२) अध्याय : दूसरा-सम्यग्दर्शन
[सम्यग्दर्शन का लक्षण-५६-६२, सम्यग्दर्शन के पाँच लक्षण-६२-६४, सम्यग्दर्शन की योग्यता-६४, सम्यग्दर्शन के भेद-६५-६६, . लब्धियों का स्वरूप-६७-७०, सम्यग्दर्शन के बहिरंग कारण व उत्पत्ति की अपेक्षा भेद -७२-७५, सम्यग्दर्शन का निर्देश आदि की । अपेक्षा से वर्णन-७५-८२, सम्यग्दर्शन को. .. .. घातने वाली प्रकृतियों की अन्तर्दशा-८३-४, सम्यग्दर्शनमहिमा-८५-८७, सम्यग्दर्शन और.
अनेकान्त-७-८८, सम्यग्दृष्टि की अन्त.. . र्दशा-८८.] : .....
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