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. * अनुक्रम * श्री गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामणि..
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अध्याय : पहलाकर्म स्वरुप वर्णन –.. ....१-५८ सच्चे मुखं का स्वरूप-१, द्रनाको के मुख्य . भेद-उत्तरभेद-१-६, : चारित्र मोहनीय के. रुपायवेदनीय कापायबेदनीय दो भेदों की. अपेक्षा भेद-प्रभेद-६-११, नामकर्म का स्वरुप भेद-प्रभेद-११-२४, गोत्रकर्म का स्वरूप व भेद-२४, अन्तराम का स्वरूप व भेद-२४२५,बंध का स्वरूप व भेद-२५-२६.पाठ . कर्मों को उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थिति-२६, पुण्य-पाप की अपेक्षा कर्मों के भेद--२६-२७, जीवविपाकी, पुद्गलाविपाकी, भवविपाको व क्षेत्रविपाकी कर्मों का स्वरूप व भेद-२८-२६, .. चौदह गुरणस्थानों में कर्मो की बंध, सत्त्व, . .. उदय की संख्या-२६-३७, संहननों का . . स्वरूप व संहननों की अपेक्षा जीवो का उत्पत्तिस्थान--३७.३६, दश प्रकार का बंध--- . ३६-४०, अायुकर्म का बंध व बंधत्रिभंगी-४०,