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जैन शास्त्रों में स्वाध्याय के पांच अंग बताए गए हैं । तत्त्वार्थसुव.. के अनुसार १. वाचना, २.. पृच्छना, ३. प्रति... पृच्छना (अनुप्रेक्षा), ४. अाम्नाय, ५.. धर्मोपदेश ये पांच अंग हैं .
(तत्यार्थस्त्र ६.२५) । व्याख्याप्रशस्ति (भगवतीसूत्र), मूलाचार आदि के अनुसार १: वाचना, २. पृच्छना, ३ परिवर्तना, ४. अनुप्रेक्षा, ५. धर्म कथा--ये ५. अंग है (व्याख्या प्रज्ञप्ति, २५.७.८०१) मूला- . चार, ३६३, उत्तराध्ययन, ३०.३४, प्रौपपा.. १६) । (१) वाचना---
निर्दोष ग्रन्थ तथा तत्प्रतिपादित अर्थ-इन दोनों के उपदेश का योग्य पात्र को प्रदान करना वाचना' है (सर्वार्थसिद्धि ६.२५) । गुरु शिष्य को मूत्रादि को 'वाचना' प्रदान करता है, भव्य जीव को मास्त्र पढ़ाता है, ग्रन्थ के अर्थ की प्ररूपणा करता है (धवला पु. ६,
पृ २५२, २६२, जै. सि. को.. ३.५३६), शिष्य उसका ग्रहण करता . ... . . . . है । वह शिष्य भी योग्य पात्रों को वाचना दे सकता है। सामान्यतः
सद्गुरु से सूत्रपाठ की शिक्षा लेकर शास्त्रों का वाचन, प्रात्मकल्याएं
हेतु निर्दोष ग्रन्थों को स्वयं पड़ना, दसरों को समझाने हेतु सुधानु.. योगी व्याख्यान करना या बाचन करना-ये सब कार्य 'वाचना' के .. अन्तर्गत हैं।
.. सूत्र-व्याख्यान के ६ भेद शास्त्रों में बताए गए हैं(१) संहिता (पद का अस्खलित, शुद्ध उच्चारण), (२) पद (वाक्य के प्रत्येक पदं का शुद्ध पृथक्-पृथक् उन्चारण) (३) पदार्थ (पद का अर्थ ); (४) पद-विग्रह, (५) पदच्छेद (चालना, शंका आदि उठाना) (६) प्रसिद्धि (उठाई गई शंकाओं का समुचित समाधान) (उदृत-सुत्तागमें [ भाग, पृ० ५८-५९) . ... सूत्रों का उच्चारणा इस तरह सांगोपांग व परिपूर्ण रूप से किया जाए कि अक्षरादि की स्खलना न हो, पदों को पृथक-पृथक कर पड़ा जाए, अपनी ओर से कोई अक्षर, पद यादि का न तो .. योग किया जाए, और न ही कमी की जाए, वर्गों का यथास्थान (उदात्तादिघोष-नियमानुरूप), सुस्पष्ट उच्चारण हो, प्रत्येक पद. :: अपनी माला में गूथे हुए फूल जैसा सुशोभित हो (अनुयोग द्वार सू० १३-१४, विशेषावश्यक भाष्य, ६५१, ८५.४-८५५.) ।
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