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स्वाध्याय का स्वरूप स्वाध्याय के स्वरूप के सम्बन्ध में विविध निरूपण प्राप्त होते हैं, जो इस प्रकार हैं--- ( 3 ) सु+-पान-अध्याय : स्वाध्याय । 'सु' यानी भली भांति (गुष्ठु)
'या' यानी मर्यादा के साथ, 'अध्ययन'-श्रुत का विशेषतः अनुशीलन 'स्वाध्याय' है । . निष्कर्षतः जिनेन्द्र-प्ररूपित शास्त्र का एकाग्र चित्त से अध्ययन-पढ़ना 'स्वाध्याय' हैं (तत्त्वानुशासन, ८०) । अध्ययन से तात्पर्य उन शास्त्रों के पठन-पाठन से है, जिनसे चित्त निर्मल होता है या जिससे तत्वबोध, संथम व मोक्ष की प्राप्ति होती है या जिसले । तत्त्वबोध, संयम व मोक्ष की प्राप्ति होती है (विशेषावश्यक
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(11) शास्त्रादि का स्व + अध्याय । यानी अपने लिए-अपनी . यात्मा के लिए-हितकारी अध्ययन करना 'स्वाध्याय है
(सर्वार्थ सिद्धि, १.२०) । HIस्व + अध्याय । यानो 'स्व' का प्रात्मा-का, अध्ययन (जिन-..
दास रिंग, दशदै. ८.८५) । प्रात्मा के प्राशय को पढ़ना, .
आत्मा के मुग्गों की खोज करना, उन्हें जीवन में उतारना, . . इस प्रकार प्रात्मा के स्वाभाविक गुणों की (मननादि .
द्वारा) प्रामिही वास्तविक स्वाध्याय है। (IV) सालस्य त्याग कर ज्ञान की प्राचावना को 'स्वाध्याय' कहते
हैं (सर्वार्थसिद्धि, ६.२०)।
यहाँ 'जान' पद से 'संच्छास्य', 'आराधना' पद से अध्ययनमनन आदि अभिप्रेत है; अतः भगवान् जिनेन्द्र द्वारा निरूपित जीवअजीवादि तत्त्वों के निरूपण करने वाले (बारह अंग, चौदह पूर्व) सन्छास्त्रों का मनन हीब्यवहार दृष्टि से--(मलावार, ५११) स्वाध्याय है। 'ज्ञान' पद से नात्मा भी अभिप्रेत होला है (प्रव. ... १.२७) । ऐसी स्थिति में आत्माराधना ही, परमार्थ दृष्टि से, . स्वाध्याय है। .
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