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________________ से ग्रथिन कर समस्त तात्त्विक विवेचना (तत्त्वार्थ) से परिपूर्ण सुव्यवस्थित शास्त्र भागम' का रूप प्रदान किया (प्रव. १/८.२, मूत्र प्रा.१, नियम ८, राज वा. ६/१३/२) । .... आगम, प्रवचन, जिनाज्ञा, जिनशासन; सिद्धान्त, श्रुत सूत्र ग्रादि शब्द एकार्थक हैं । परवर्ती प्राचार्यों ने भी पर कल्याण के उद्देश्य से उपदेश दिया (प्रत्र. ३/४८}; और. जैत शासन की ज्ञानधारा को अनवरत रुप से प्रवाहित किए रखा । इन प्राचार्यों मेंपुष्पदन्त, भूतवलि, गुणधर, कुन्दकुन्द; बट्टकेर, शिवकोटि, उमास्वामी, समन्तभद्र, पूज्यपाद, योगेन्दु, यतिवृषभ, अकलंक, जिनसेन, विद्यानन्दि, वीरसेन, गुणभद्र, अमृतः चन्द्र, सोमदेव, शुभचन्द्र स्वामी, कातिकोये, पयनन्दि नेमीचन्द्र बीरनन्दि आदि प्रमुख हैं। : ... ... ... . .. तंटस्थ एवं प्रामाणिक पूर्वोक्त प्राचार्य-गुरुओं की परम्परा से प्राप्त समस्त साहित्य प्रमाण भूत माना जाता है (धवला पु. १३, पृ. ३८२, पुः १, पु. १६७-१९८) । प्राचार्य-परम्परा के माध्यम से . प्राप्त जिनवाणी का अध्ययन प्रत्येक जैन मुमुक्ष का कर्त्तव्य है, .. क्योंकि इसके अध्ययन द्वारा ही भव्य जीव मोक्ष मार्ग का पथिक होता है (सूत्र प्रा. २)। शास्त्ररुपी पालोक के बिना विशाल ज्ञानरुपी आँखें भी मोहान्धकार से व्याप्त कल्याणरूपी मार्ग को देख नहीं पाती. (अनगार-१/१५) जिनवाणी को समस्त दुःखों का क्षय करने वाली अमोघ औषधि माना गया है. (दर्शन प्रा. १७) । इसका अनुशीलन करने वाला अपने : संसार-चक्र का नाश करता है (सूत्र प्रा. ३) । जिनवाणी के माध्यम से जीव-अजीब आदि पदार्थों के स्वरूपादि का निश्चय तथा उनके परस्पर--भेद का यथार्थ बोध होता है, और फल- ..... स्वरुप मोह नष्ट होकर सम्बग्ज्ञान की प्राप्ति होती है (मोक्ष प्रा.४१, ... ३८, प्रव. १/८६ सम्यग्ज्ञान से हेय-उपादेय का ज्ञान होता है फलस्वरुप : .: एकाग्रता, शील सम्पन्नता व संयमवृत्ति के साथ निर्धारण का मार्ग . प्रशस्त होता है । तस्यज्ञानी की प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति-दोनों मोक्षगा-. . मिनी होती हैं (आत्मानु पृ. १८०) 1 तत्वज्ञान प्राप्ति का प्रमुख साधन . . . . 'स्वाध्याय' है, जिसे विशिष्ट तप बाहर गया है (अनगार ३/२३).!.. : ... +91- 7 RIASINESrompowermergin-rview awr-7.--
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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