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Hama rapalo
प्रस्तावना
जैन धर्म निवृत्ति-प्रधान धर्म है। निवृत्ति की महत्ता प्रवृत्तियों के वातावरण में अधिक निखरती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार परिसह के वातावरण में त्याग की. उज्ज्वलता प्रगट होती है। जैन धर्म के प्राव तीर्थकर भगवान् ऋषभदेव असि, मसि मादि लौकिक प्रवृत्तियों के स्वयं सूत्रधार थे, अपार राज्य वैभव के स्वामी थे, किन्तु उन्होंने वैराध्य धारमा कर त्याग व निवृत्ति का मार्ग अपनाया, और तप व साधना से परमात्मा पद प्राप्त किया। (मोह- .. नीय) कर्मावरण के हटने पर उनके स्वच्छ व निर्मल 'ज्ञान' के प्रकाश में समस्त लोकालोक प्रतिविम्बित हो उठा था। इस ज्ञानसूर्य . को किरणे 'दिव्य ध्वनि' के रूप में प्रस्फुटित हुई और जनता को उपदेश सुनने का सोभाग्य प्राप्त हुआ । अनेक भव्य जनों को प्रतिबोधित. होकर आत्मकल्याण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ । जनता . को भवसागर से तिरने का मार्ग प्रशस्त हुप्रा, अतः वे प्रथम तीर्थंकर कहलाए। समस्त कर्मों का क्षय कर वे सिद्ध-बुद्ध, मुक्त हुए ।
. ऋषभदेव के अनन्तर कालक्रम से २३ तीर्थकर और हुए. जिनमें अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर थे। सभी प्रहन्तों व तीर्थकरों की तरह के भी जनता को भवसागर से मुक्ति का मार्ग दिखाकर स्वयं मुक्त हुए। पूर्व हीर्थकरों की तरह ही उनकी अर्थवागी को उनके निकटस्थ विशिष्ट प्रतिमाधारी गणधरों (गणेशों) ने शब्दरूप