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दिगम्बर ग्रन्थों में वाचना के चार प्रकार इस प्रकार बताए गाए हैं.---(१) नन्दा (२) भद्रा (३) जया (४) सौम्या (धवला पु० ६, पु० २५२) ।
___ नन्दा--सम्यग्दर्शनों को पूर्व पक्ष के रूप में उपस्थापित कारा (जैन) मनमो सिद्धान्त रूप में उगस्थापित करने की वाचना 'नन्दा' है (धवला पु० ६, २५२) ! .
.. जया-पूर्वापर--विरोध-परिहार के बिना सिद्धान्त--अर्थों का कथन 'जया' वाचना है (उत्त० १.५८ नियुक्ति, शांतिरिवृत्ति ।
भद्रा- युक्तिपूर्वक समाधान कर पर्वापर-विरोध को हटाते हये समस्त पदार्थों की व्याख्या 'भद्रा वाचना' है। सूत्रार्थ का पूर्वापर--संगति के साथ अपने लिए ज्ञान से, तथा दूसरों के लिए वचनों से.. निर्गमना (निर्यापना=अर्थ-निरूपणा) वाचना-सम्पद कहो जाती है (उत्तराध्ययन १.५८ नियुक्ति शांतिसूरि वृत्ति । .
___ सौम्या-~-कहीं-कहीं स्खलन बृत्ति से, (थोड़ा-थोड़ा भाग छते हए) की जाने वाली याचना 'सौभ्या' है (उत्तराध्ययन .१.५८ नियुक्ति शांतिसूरि वृत्ति)।
. याचना की - स्थिति में शिष्य को मान, क्रोध, प्रमाद, ग्रालस्य आदि से रहितं होना चाहिए (उत्तरा ११.३) । (२) पृच्छना
संशय का उच्छेद करने या निश्चित बल (महत्त्व) को पुष्ट करने हेतु प्रश्न करना 'पृच्छना' है (सर्वार्थसिद्धि, ६.२५, रा. बार्तिक १.२५.२, अनगार धर्मामत, ७.८४, धवला पु.. १४ पृ. ६)। शास्त्रों के संदिग्ध प्रर्थ को किसी दूसरे से पूछना, सत्पथ की और ..... बढ़ने हेतुं मोक्षादिमार्ग का स्वरूप निश्चित करता, संशय-निवारणार्थ । प्रश्न या जिज्ञासा करना । पढ़ते समय या पढ़ने के बाद, शिक्षा के मन में जहाँ कोई शंका उठे ऐसी स्थिति में, अथवा कोई बात आगम में स्पष्ट न हो सकी हो, उसके सम्बन्ध में गुरुजनों से समाधान पाने . . . . . . का प्रयत्न करना 'पृच्छना' है. (धवला पुः ६. पृ. २६२, धवला पु. १४, पृ. ६)। ये प्रश्न एक प्रकार से विषय की सुस्पष्टता के लिए प्रारम्भिक कदम है। इसीलिए शास्त्रों में प्राचार्यादि बहुश्रुत के
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