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________________ समक्ष अर्थ - विनिश्चय हेतु जिज्ञासा रखने की प्रेरणा दी गई है (ला.पु. पू. २०५१ (३) परिवर्तन ( या श्राम्नाय ) गृहीत ज्ञान को स्थायी बनाने हेतु किसी सूत्र का या पठित शास्त्र का, श्राचारविद व्रती द्वारा स्वयं किया गया बार-बार शुद्ध (पाट-दोषों से रहित ) पाठ 'परिवर्तना' है ( तत्त्वार्थं ६.२५ श्रुत• सागरीय वृत्ति) । परिचित श्रुत का मर्म समझने तथा स्मृति में पूर्णता स्थिर करने हेतु यह एक प्रकार का परिशीलन या पर्यालोचन भी है (बला पु. ८, पृ० २६२ ) । पटित ग्रन्थ का शुद्ध-शुद्ध उच्चारा करते हुए बार-बार पाठ से तत्सम्बद्ध ग्रंथ मन में दृढता से बैठता जाता है । (४) अनुप्रक्षा सन्देह की स्थिति में विगत शास्त्रों में प्रतिपादित पदार्थ तात्त्विक दृष्टि से, पुनः पुनः (सर्वार्थसिद्धि ९२५) तत्त्वा ९ ), मन की स्थिरता पूर्ण रूप से हृदयंगत 'का, सुते हुए अर्थ का श्रतानुसार मन में खास गम्भीर चिन्तन-मनन ६. २५ भाप्यानुसारी टीका; घयला पु. १४, पृ. हेतु वस्तु स्वभाव एवं पदार्थ स्वरूप का या श्रुतज्ञान का परिशीलन पर्यालोचन 'अनुक्षा' (६ धवला पु. ६, पू. २६२ तत्त्वा श्रुतसागरीय वृत्ति ६.२५ तत्त्वार्थ राजवार्तिक ६.२५.३६ चारित्रसार, पृ. ६७० श्रनुयोगद्वार हरिभद्रीय वृत्ति ७, पृ० १० तस्वार्थसार ७२० श्राचारसार, ४.६१; धर्मशर्मास्वोपजवृत्ति, ३.५४) (५) धर्मोपदेश सर्वज्ञप्रणीत ग्रहिसादि लक्षण रूप धर्म का कथन ( अनुयोग ) धर्मकथा या थर्मोपदेश है ( सर्वार्थसिद्धि २.२५) । इसके अन्तर्गत स श्लाका पुरुषों का चरित्र पढ़ना चित्त को विषयों से रोक कर शान्तिदायी पाठों का अभ्यास तथा उन्हें कंठस्थ करनाचिन्तन-मनन के बाद तत्त्व रहस्य जब स्वयं को उपलब्ध हो जाए तव विचारामृत को जन-जन के समक्ष प्रस्तुत करना, दूसरों को सत्य के अन्वेषण हेतु मार्ग बताना, तथा सन्देह-निवृत्ति हेतु पदार्थ का स्वरूप zywdydragareEROFICTIOPAPAR
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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