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वताना, न शादि धर्म की व्याख्या करना, तथा श्रोतानों मैं रत्नत्रय . को प्राप्ति हेतु प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने के लिए स्वतन्त्र रूप से श्रामिक उपदेशादि द्वारा बढ़ाना आदि परिगरिंगत हैं ।
प्रमुखतः दिगम्बर मतानुसार प्रथभानुयोग रूप, श्वेताम्बरमतानुसार धर्मकथानुयोग रूप शास्त्र धर्मकथा या धर्मपिदेश' में परिगणित हैं (महापुराण १.१२०) ।
धर्मोपदेश, अर्थोपदेश, व्याख्यान, अनुयोग-वर्णन--ये सब पर्यायवाची शब्द हैं तत्त्वा ६.२५ भाप्य टीका । ...... स्वाध्याय को महसा
. . शास्त्रों में श्रावक (जैन) के ६ आवश्यक दैनिक क्रम वताए गए हैं, उनमें स्वाध्याय (तस्वाभ्यास आदि) की भी परिगणना की गयी है (पचनन्दि पंच ६.७; १.१३; चारित्रसार पृ. ४३.; जै. सि. को. ४.५१ । ..
साधु के लिए जो यावश्यक ६ क्रियाए निर्धारित है, उनमें स्वाध्याय भी एक है । केवल चार घड़ी सोने के अलावा मुनि अपना समय अावश्यक धर्मक्रियायों में ही लगाता है। उनमें भी स्वाध्याय में मुनि, को आठ प्रहर के पूरे दिन-रात में, चार प्रहर का समय (यानी प्राधा समय व्यतीत करना होता है। प्रथम प्रहर में सूत्र स्वाध्याय, द्वितीय प्रहर में (भूत्रार्थ-चिन्तन) ध्यान, तृतीय में भिक्षाचर्या, चतुर्थ में पुनः स्वाध्याय करने की मुनिचर्या शास्त्रों में निहित है (उत्तरा- ध्ययन मुत्र. २६.११ १२, २६.१७-१८, २६.४३) । इस विधि--.. विधान में युटि पाने पर 'प्रतिक्रमण' में उक्त भूल का प्रायश्चित्त . करता है (सामायिक अावश्यक प्रतिक्रमण. सूत्र; आवश्यक सूत्र; सावयावस्मय सुत्त-प्रतिक्रमण सूत्र-ज्ञानातिचार पाठ) : ... प्रस्तुत ग्रन्थ
... आज का युग व्यस्ततानों से भरा हैं, ऐसी स्थिति में विशालकाय व अनेक जैन आगमों का स्वाध्याय कर पाना कठिन है। . बड़ी प्रसन्नता की बात है कि स्वाध्यायं तपोमूर्ति परम पूज्य १०६ गरणधराचार्य कुन्थुनागर जी महाराज ने अपने जीवन के स्वाध्याय
मा
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