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विवेचना उत्तर- प्रत्युत्तरों द्वारा यत्र तत्र अत्यन्त आकर्षक रूप में निरूपित है । स्वाध्याय प्रेमियों के मस्तिष्क को पुष्ट और स्वस्थ बनाने में यह ग्रन्थ सक्षम होगा । स्वाध्याय परम तप । तप से निर्जरा होती है। निर्जरा का फल मुक्ति है ।
मुक्ति का सार सुख है । शाश्वतिक यानन्द ! ग्रात्मानन्द में स्थित, यह ग्रंथ अविनश्वर सुख का साधन सिद्ध होगा इस प्रकार के विशाल और उत्तम ग्रन्थ का संग्रह करना जितना कठिन है, उतना ही सम्पादन - प्रकाशन भी । जो भी सम्पादक मण्डल, संशोधक जब इस कार्य में अपना अमूल्य समय सानन्द, भक्ति और ज्ञान विनय पूर्वक दे रहे हैं, यह परम हर्ष का विषय है, हमारा इसके लिये प्रकाशन संयोजक श्री शान्ति कुमार जी. गंगवाल व उनके सहयोगियों को पूर्ण आशीर्वाद है, वे देव, -शास्त्र, गुरु के अकाट्य श्रद्धालु बने। इस कार्य में पूर्ण सफल हों । ज्ञानी बनकर स्वयं इस प्रकार के ग्रन्थों के निर्माण की योग्यता प्राप्त करें। जिनवाणी का प्रचार-प्रसार करते हुए ज्ञानावरणी कर्म को जीर्ण बना यथार्थ - जानी, स्याद्वादी बने ।
अनेकान्त सिद्धान्त का घर-घर और जन-जन में प्रचार हो यहीं हमारी सभावना है । ग्रन्थमाला भी उन्नतिशील हो और सत्त श्री जिनवाणी का प्रकाशन करती रहे ।
- प. प्रा. विजयामली