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[ गो. प्र. चिन्तामणि अथवा यह सूत्र व्यवहार काल के प्रमाण को न बतलाकर मुख्यकाल के प्रमाण को ही बतलाता है । एक ही कालाणु अनन्त पर्यायों की वर्तनर में हेतु होने के कारण उपचार से अनन्त समय वाला कहा जाता है। समय काल के उस छोटे से छोटे अंश को कहते हैं, जिसका बुद्धि के द्वारा विभाग न हो सके । मन्दगति से चलने वाले पुद्गल परमाणु को आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक चलने में जितना काल लगे, उतने काल को समय कहते हैं।
यहां समय शब्द से प्रावली, उच्छ्वास आदि का भी ग्रहण करना चाहिये । असंख्यात समयों का एक प्रावली होती है । संख्यात् प्रावलियों का एक उच्छवास होता है । सात उच्छ्वासों का एक थोव होता है और सात थोवों का एक लव होता है । साढ़े अड़तीस लवों की एक नाली होती है। दो नालियों का एक मुहूर्त होता है, और पावली से एक समय अधिक तथा मुहूर्त से एक समय कम अन्र्तमुहर्त का काल है। इसी तरह माह, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, पल्योपम आदि की गणना होती है । . इल्य का लक्षण ---
दुव्याश्रया निगुणा गुस्साः ॥१२७७॥ जो द्रव्य के आश्रित हों और स्वयं निर्गुण हों, उनको गुरण कहते हैं ।
निगुण विशेषरण से घणुक, व्यणुक आदि स्कन्धों की निवृत्ति हो जाती है। यदि 'द्रव्याश्रयागुरणाः' ऐसा भी लक्षण कहते तो द्वयणुक आदि भी गुण हो जाते. क्योंकि ये अपने कारणभूत परमाणु द्रव्य के प्राश्रित हैं। लेकिन जब यह कह दिया गया कि जो मुरण को निर्गुण भी होना चाहिये तो दूधणुक आदि गुण नहीं हो सकते, व्योंकि निर्गुण नहीं है, किन्तु गुरण सहित हैं।
। यद्यपि घर संस्थान आदि पर्यायें भी द्रव्याश्रित और निर्गुण हैं, लेकिन वे गुरण नहीं हो सकती, क्योंकि 'द्रव्याश्रया' का तात्पर्य यह है कि मुराग को सदा द्रव्य के आश्रित रहना चाहिये । और पर्यायें कभी-कभी साथ रहती हैं, वे नष्ट और उत्पन्न होती रहती है, अतः पर्यायों को गुण नहीं कह सकते। नैयायिक गुरंगों को द्रव्य से पृथक् मानते हैं, लेकिन उनका ऐसा मानना ठीक नहीं है। यद्यपि संज्ञा, लक्षण आदि के भेद से द्रव्य और गुण में कथञ्चित भेद है, लेकिन द्रव्यात्मक और द्रव्य के परिणाम या पर्याय होने के कारण गुण द्रव्य से अभिन्न हैं।
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