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अध्याय : आठवां ]
[ ५६१ पर्याय का वर्णन----
तभावः परिणामः ॥१२७८।।
धर्मादि द्रव्यों के अपने-अपने स्वरूप से परिणमन करने को पर्याय कहते हैं। धर्मादि द्रव्यों के स्वरूप को ही परिणाम कहते हैं । परिणाम के दो भेद हैं- सादि
और अनादि । सामान्य से धर्मादि द्रव्यों का गत्युपग्रह आदि अनादि परिणाम है और वही परिणाम विशेष की अपेक्षा सादि है । तात्पर्य यह कि गुण और पर्याय दोनों ही द्रव्यों के परिणाम हैं।
* जीव-वर्णन * श्रीमतस्त्रिगणनामा गर्नु कि श्री का नाताम् । बन्वे धर्माधिपानः पञ्च परमेष्ठिन उत्तमान् ॥१२७६॥
जो तीन जगत के नाथ हैं, सज्जन पुरुषों को स्वर्ग और मोक्ष लक्ष्मी प्रदान करने वाले हैं, तथा धर्म के अधिनायक हैं, ऐसे परमोत्कृष्ट पंचपरमेष्ठियों को मैं नमस्कार करता हूँ ।
अब वक्ष्यमारण विषय की प्रतिज्ञा करते हैं :--- अथ यैः पूरितो लोकः क्वचिस्ववचित्रसाङ्गिभिः । सर्वत्र स्थावर जीवन तामेश्च सूरिभिः ॥१२८०॥ पायुः कायाक्षसंस्थान जाति वेद कुलादिभिः।। तांस्त्रसान् स्थावरान् सर्वान् वक्ष्ये सप्तां दयाप्ततये ॥१२८१॥
यह लोक कहीं-कहीं स जीवों से भरा हुआ है, किन्तु स्थावर जीवों से तो सर्वत्र भरा हुआ है, अतः सज्जन पुरुष दया पालन कर सकें, इसलिए मैं सर्व अस और स्थावर जीदों के नाना प्रकार के भेद-प्रभेद, आयु, काय, इन्द्रियां, संस्थान, जाति, बेद और कुल आदि का विवेचन करूंगा। जीव के भेद और सिद्ध जीव का स्वरूप--
सिद्ध संसारि भेदाभ्यां स्युद्विधा जोवराशयः । सिद्धा भेदादि निष्कान्ता अनन्ता ज्ञान मूर्तयः ॥१२८२१॥
सम्पूर्ण जीव राशि सिद्ध और संसारी के भेद से दो प्रकार की है, जिसमें सिद्ध जीब भेद-प्रभेदों से. रहित और अनन्त ज्ञान मूर्ति स्वरूप हैं।..