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________________ - . ५६२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि संसारी जोच के भेद और स्थावर जीवों के प्रकार--- अस स्थावर भेदाभ्यां द्विधा संसारिणोऽङ्गिनः । पृथिव्यादि प्रकारश्च पञ्चधा स्थायरा मताः ॥१२८३॥ त्रस और स्थावर के भेद से संसारी जीव दो प्रकार के हैं। उनमें स्थावर जीव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति कायिक के भेद से पांच प्रकार के हैं । त्रस और स्थावर जीवों को पृथक्-पृथक् संख्या--- पृथ्व्यप्तेजोऽग्नि मरुन्नित्येतर काय मयात्मनाम् । सप्त सप्तव लक्षाणि प्रत्येकं सन्तिः जातयः ॥१२॥४॥ जातयो दश लक्षारिण वनस्पति शरीरिणाम् । प्रत्येकं विद्विलक्षाणि द्वित्रितुर्येन्द्रियात्मनाम् ॥१२८५।। तिर्यग्नारकदेवानां प्रत्येक स्युश्च जातयः । चतुर्लक्षारिण लक्षाणि अतुर्दशनृजातयः ॥१२८६॥ इत्थ चतुरशीतिश्च लक्षारिख जीधजातयः । अधुना विस्तरेणषां काञ्चिजाति वे पृथक् ।।१२८७॥ पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, नित्य निगोद और इतर निगोद, इन छह प्रकार के जीवों में से प्रत्येक की सात-सात लाख जातियाँ होती हैं । बनस्पति कायिक जीवों की दश लाख, द्वीन्द्रिय जीवों की दो लाख, बेन्द्रिय की दो लाख, चतुरिन्द्रिय की दो लाख, पचेन्द्रिय तिर्यञ्चों की चार लाख, नारकियों की चार लाह, देवों की चार लाख, मनुष्यों की चौदह लाख जातियां होती हैं । इस प्रकार सम्पूर्ण संसारी जीवों की कुल जातियां (७ ला.-७ ला.+ ७ ला. १७ ला. + ला. + ७ ला. + १०.ला. + ६ ला. + ४ ला.+४ ला.+४ ला.+१४ ला.) = ८४००००० अर्थात् चौरासी लाख जातियां (योनियाँ) होती है । अब इन जातियों में से कुछ जातियों का पृथक् पृथक् विस्तार पूर्वक कथन करते हैं। पृथ्वी के चार भेद और उनके लक्षण--- पृथिवी पृथिवीकायः पृथिकायिकस्तथा। पृथिवीजीच इति ख्याता पृथ्विीभेवाश्चतुविधाः ॥१२६८॥ मार्गोपमादिता धूलिः पृथिवी प्रीच्यसे बुधैः । निर्जीव इष्टिकादिश्च पृथिवी कायो मतः श्रुते ॥१२८६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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