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________________ अध्याय : पाठवां ] में स्वप्रत्यय प्रौव्य है । उत्पाद और व्यय स्वप्रत्यय और पर प्रत्यय दोनों प्रकार से होते हैं । अगुरुलघु गुरगों को हानि और वृद्धि की अपेक्षा काल में स्वप्रत्यय उत्पाद और व्यय होता रहता है। काल द्रव्यों के परिवर्तन में कारण होता है । अतः परप्रत्यय उत्पाद और व्यय भी काल में होते हैं । ___ काल में साधारण दोनों प्रकार के गुरणं रहते हैं । अचेतनत्य, अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरुलधुत्व अादि काल के साधारण गुण हैं । द्रव्यों के परिवर्तन में हेतु होना. काल का असाधारण गुरण है । इसी प्रकार काल में पर्यायें भी उत्पन्न और विनष्ट होती रहती हैं । अतः जीवादि की तरह काल भी द्रव्य है। प्रश्न :-काल द्रय को पृथक क्यों कही ? पहले "जीवकाया धर्मा धर्मा कांश काल पुदगलाः" ऐसा सूत्र बनाना चाहिये यां। ऐसा करने ' से कॉल द्न्य का पृथक वर्णन न करना पड़ला ? - उत्तर :-यदि "अंजीवकाया" इत्यादि सूत्र में काल द्रव्य को भी सम्मिलित कर देते तो धर्म आदि द्रव्यों की तरह काल भी कार्य हो जाता, लेकिन काल द्रव्य मुख्य और रहार दोनों हार से काम नहीं है। पहिले निष्क्रियाणि च" इस सूत्र में धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य को निष्क्रिय बतलाया है । इनके अतिरिक्त अन्य सक्रिय हैं । अतः पूर्व सूत्र में काल का वर्णन होने से काल भी सक्रिय द्रव्य हो जाता है और "r आकाशदेकद्रव्यम्" इसके अनुसार काल भी एक द्रव्य हो जाये । लेकिन काल न तो सक्रिय है और न एक द्रव्य है । इन कारणों से काल द्रब्य का वर्णन पृथक् किया गया है। काल द्रव्य अनेक है, इसका तात्पर्य यह है कि लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश-प्रदेश : पर एक-एक कालाणु रत्नराशि के समान पृथक्-पृथक् स्थित है। लोकांकाश के प्रदेश असंख्यात होने से काल द्रव्य भी असंख्यात है । कालाणु अमूर्त और निष्क्रिय हैं, तथा सम्पूर्ण लोकाकाश में व्याप्त हैं। व्यवहार काल का प्रमाण सोऽनन्ससमयः ।।१२७६॥ व्यवहार काल का प्रमाण अनन्त समय है । यद्यपि वर्तमान काल का प्रमाण एक समय ही है, किन्तु भूत और भविष्यत् काल की अपेक्षा से काल को अनन्त समय वाला कहा गया है। " EERUTINAमाTANHAIREDMIG24 NitinARiming
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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