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। गो. प्र. चिन्तामणि परिणमन न हो सकेगा। इसी प्रकार जल और सत्तू में परस्पर सम्बन्ध होने पर जल पारिणाम होता है।
___इस प्रकार बन्ध होने पर ज्ञानावरण, दर्शनावरण आदि कर्मों की तीस कोड़ा कोड़ी सागर की स्थिति भी बन जाती है. क्योंकि जीव के साथ पूर्व सम्बद्ध कार्मरण द्रव्य स्निग्ध प्रादि गुरगों से अधिक हैं । द्रव्य का लक्षण
गुरण पर्यवद् द्रव्यम् ।।१२७४॥ ..
जो गुण और पर्याय बाला हो, वह द्रव्य है । गुरण अन्वयी (नित्य) होते हैं। अर्थात् द्रव्य के साथ सदा रहते हैं. द्रव्य को कभी नहीं छोड़ते । गूरणों के द्वारा ही एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य से भेद किया जाता हैं । यदि गुण न हों तो एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप भी हो जायेगा । जीवनमा पनि को द्रव्यों से पृथक् करता है । इसी प्रकार पुद्गलादि द्रव्यों के रूपादि गुण भी उन द्रव्यों को अन्य द्रव्यों से पृथक् करते हैं।
पर्याय व्यतिरेकी (अनित्य होती है, अर्थात् द्रव्य के साथ सदा नहीं रहती बदलती रहती हैं । गुरगों के विकार को ही पर्याय कहते हैं, जैसे - जीव के ज्ञान गुण की घट ज्ञान, पट ज्ञान प्रादि पर्यायें । व्यवहार नय की अपेक्षा से पर्याय द्रव्य से कथञ्चित् भिन्न हैं । यदि पर्याय द्रव्य से सर्वथा अभिन्न हों, तो पर्यायों के नाश होने पर द्रव्य का भी नाश हो जायगा। .
कहा हैं कि द्रव्य के विधान करने वाले को गुण कहते हैं । और द्रव्य के . विकार को पर्याय कहते हैं । अनादि निधन द्रव्य में जल में तरंगों के समान प्रतिक्षण पर्याये उत्पन्न और विनष्ट होती रहती हैं। द्रव्य में गुण और पर्याय में सदा रहती हैं । गुण और पर्यायों के समूह का नाम ही द्रव्य है । गुण और पर्याय को छोड़कर द्रव्य कोई पृथक् वस्तु नहीं है । काल द्रव्य का वर्णन---
कालश्च ।।१२७५॥ ... काल भी द्रव्य है; क्योंकि उसमें द्रव्य का लक्षण पाया जाता है । द्रव्य का लक्षण उत्पाद व्यय ध्रौव्ययुक्त और गुण पर्ययवद् द्रव्यम्' बतलाया है। काल में दोनों प्रकार का लक्षण पाया जाता है । स्वरूप की अपेक्षा नित्य रहने के कारण काल में
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