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________________ की . अध्याय : ग्यारहवां ] [ १००३ अनन्त प्रमेयत्व पना (ज्ञान पना) आवश्यक है। यदि अनन्त ज्ञान है, तो एक समय समस्त ज्ञेय पदार्थों को एक साथ जान सकते हैं, केवल ज्ञान में अनन्त ज्ञायकत्व पना है। इस कारण अनन्त धर्मात्मक वस्तु युगपत् ज्ञान का विषय हो जाती है, किन्तु ज्ञात पदार्थ का प्रतिपादन करने के लिये जिसका माध्याम (Medium ) लिया जाता है। उस शब्द रूप वचनों में अनन्त धर्मों की युगपत प्रतिपादन करने की शक्ति नहीं होने के कारण वह वस्तु का आंशिक प्रतिपादन करता है। जैसे किसी व्यक्ति के पास १० मीटर वस्त्र है, उस व्यक्ति ने उस वस्त्र को नापना चाहा । यदि उसके पास १० मीटर वाला मापदण्ड हो तो वह एक साथ वस्त्र को भाप सकता है, किन्तु उसके पास १ मीटर वाला मापदण्ड है इस कारण उसको १० बार नापना पड़ता है। वह एक या दो मीटर माप करते हुये यह नहीं सोचता है कि जो मैं वर्तमान में १ मीटर परिणाम रूप वस्त्र माप कर रहा हूँ, वस्त्र उतना नहीं है किन्तु वह जानता है कि बस्त्र जितना लम्बा है उतना ही है किन्तु मैं वर्तमान में १ मीटर लम्बा वस्त्र को माप रहा हूँ, इस प्रकार इस रूप से ज्ञान का विषय होने पर भी पूर्ण रूप से वचनों के अगोचर है। अनेकान्तात्मक वस्तु को निर्दिष्ट-यथार्थ रूप से कथन करने वाले कथन को (भाषा को) अनेकान्तवाद, अनेक धर्म वाद या स्याद्वाद कहते हैं। "अनेकान्तात्मक अर्थ कथनं स्थाद्वादः' -अनेकान्तात्मक-अनेक धर्म (स्स्वभाव ) विशिष्ट वस्तु का कथन करना स्याद्वाद है। The meaning of the word 'Anekantvada' The word Anekantvada' consists of three woris; Aneka 'Anta' and Vada. 'Aneka' means many. 'Anta' signifies attributes and Vada' means description. The whole word means the description of many fold attributes. - "स्याद्वाद" -- (स्यात् +वाद) स्यात्-किसी निश्चित अपेक्षा से अनेक धर्म समूह को विषय करने वाला । इस शब्द द्वारा अनेकान्त और सम्यक् एकान्त का बोध कराने वाला । वाद-कथन । स्याद्वाद वस्तु के यथार्थ रूप का निश्चय करने के कारण स्याद्वाद अर्थ यथार्थ कथन है । Syadvada consists of two words; syat and Vada.' This syat suggests. The existence of infirite attributes a tlough the expression asserts about a particularattributes Syat' suggerts the from a particular stand-pont the trut reveals it self in a particular form. From other view-point the same substartum appears to possess other attributes.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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