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________________ अध्याय ग्यारहवां अनेकान्त एवं स्याद्वाद अनेकान्त की वृष्टि में भाग्य एवं पुरषार्थ का स्वरूप 1 त परमागमस्य बोजं निषिद्धजात्यन्ध सिन्धुर विधानम् । सकल नय विलसितानां विरोधमथनं नामान्यनेकान्तम् ॥२१२५॥ विश्व की समस्त वस्तु श्रनेकान्त स्वरूप होने के कारण उसको प्रतिपादन करने वाली वाणी भी अनेकान्त स्वरूप ही होना चाहिए ? यह सिद्धान्त नहीं है कि "प्रतिपादन करने वाली वाणी अनेकान्त स्वरूप है, इस कारण वस्तु श्रनेकान्तात्मक है ।" अनेकान्त का अर्थ "अनेके अन्ताः धर्माः यस्यासौ स अनेकान्तः " ( अनेक + अन्त ), जिसमें अनेक अन्त अर्थात् धर्म पायें जाते हैं । उसे अनेकान्तामक कहते हैं। समस्त वस्तुएँ अनेकान्त स्वरूप हैं इसलिये वस्तु अनेकान्त मय है | Who have many characteristics that is cailed 'Anekant' that means Substances. 'जिनेके अनेक धर्म (स्वभाव ) है, उसको अनेकान्त कहते हैं अर्थात् वस्तु) में यह अनेक धर्मात्मकपना किसी ने कभी प्रवेश नहीं करा दिया। यह वस्तु का स्वरूप होने से अनादि से स्वतः सिद्ध है | “यदीयं स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के वयम् " -- यदि यह अनेक धर्मरूपता वस्तु को स्वयं पसन्द है, ( उसमें है, वस्तु स्वयं राजी है) तो हम बीम में अराजी (नहीं मानने वाला) कौन ? जो अस्ति रूप है, वह अनेकान्तात्मक है एवं वही वस्तु अर्थ क्रिया कारी बन सकती है जं वच्यु ग्रयत तं चित्र कज्जं करेदि रिrयमेण । कज्जकरं दीस लोए ॥२२५॥ बहुधम्म जुदं अस्थ स्वा. कीर्ति क्योंकि लोक भी कार्य की अर्थ -- जो वस्तु श्रनेकान्त रूप है, वही नियम से कार्यकारी है, में बहुत धर्मयुक्त पदार्थ ही देखा जाता है । "सिद्धिरने कान्तात्" किसी सिद्धि अनेकान्त से ही हो सकती है । उपरोक्त प्रमाण से सिद्ध हुआ कि प्रत्येक सत् श्रनन्त धर्मात्मक है, अनन्त afree प्रमेय को (ज्ञेय) प्रमाण का विषय करने के लिये (ज्ञान करने के लिये )
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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