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पहला ]
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तथा उसके मध्यम ग्रंश से मरकर सौधर्म ईशान के दूसरे पटल के बिमल नाम के इंद्रक से लेकर सनत्कमार माहेन्द्र के अन्तिम पटल के नीचे पटल के बलभद्र नाम के इन्द्रक तक विमानों में पैदा होता है।
कृष्ण लेश्या के उत्कष्ट अंश से मरकर जीव सातवें नरक के अवधि नामा इंद्रक बिल में पैदा होता है। इसी के जवन्य अंश से. मरकर जीव : पांचवें नरक के अंत मदद के तिषिय ना में तथा ग्राम अंश से मरकर सातवें नरक के शेप चार बिलो में व छटे नरक के तीनों पटलों में व पांचवीं पृथ्वी के अंतिम पटल में यथायोग्य उपजता है। . .
. नील लेश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर जीव पांचवें नरक के अंतिम पटल से पहले पटल के अंध नामा इंद्रक में व जन्य अंश से मरकर तीसरी वालुका पृथ्वी के अंत पटल में संप्रज्वलित नाम इंद्रक में ब मध्यम अंश से मरकर बालुका पृथ्वी के संप्रज्वलित इंद्रक से नीचे चौथी पृथ्वी के सात पटलों में व पांचवें नरक के अंत्र इन्द्रक से ऊपर पैदा होता है ।
___ कापोत लेश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर जीव तीसरे नरक के पाठवें पटल के संप्रज्वलित नाम इन्द्रक में, जघन्य अंश से मरकर पहली पृथ्वी के पहले सीमान्त का नामा इन्द्रक में, मध्यम ग्रंश से मरकर इन दोनों के मध्य में पैदा होता है।
तथा कृष्ण, नील, कापोत इन तीन लेश्याओं के मध्यम अंश से मरे ऐसे कर्म भूमियां मिश्यादृष्टि तिर्यंच या मनुष्य और तेजो लेश्या के माध्यम अंश से मरे ऐसे भोगभूमिया मिथ्यादृष्टि तियंत्र या मनुष्य तीन प्रकार के भवन वासी, व्यंतर व ज्योतिष देवों में उपजता है ।
कृष्णा, नील, कापोत, पीत इन चार लेश्याओं के मध्यम अंग से मरे तिर्यंच या मनुष्य या भवनवासी, व्यतर, ज्योतिषी या सौधर्म, इयान स्वर्ग के बासी देव मिथ्या ष्टि सो बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक, जलकायिक, व वनस्पतिकायिक में पैदा होता है। यहाँ भवनश्रयादि देवों के मात्र पीत : लेश्यासे व तीर्यच या मनुष्यों के कृष्णादि तीन लेश्यामों से भरा होता है ।
तथा सामान्य नियम यह है कि भवनत्रिक को ग्रादि लेकर सर्वार्थ
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