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. गो. प्र. चिन्तामगि सिद्धि तक देव व धम्मा ग्रादि सात पृथ्वी संबंधी नारकी अपनी-अपनी लेण्या के अनुसार यथायोग्य मनुष्य गति या तियंच गति को जाता है । यह भी बात जान लेनी चाहिये कि जिस गति सम्बन्धी पहले प्रायु बांधी हो । उस ही गति में मरण के समय होने वाली लेश्यां के अनुसार यह जीव पैदा होता है । जैसे मनुष्य के पहले देव गायु का बंध हुवा हो, फिर मरण होते. समय कृष्ण प्रादि अशुभ लश्या हो तो भवनत्रिक में ही पैदा होता है-ऐसा
ही नियम और स्थानों में भी जानना। प्रश्न :-गरणस्थान किसे कहते हैं ? उत्तर :--मोह और योग के निमित्त से प्रात्मा की तारतम्यरूप (उत्तरोत्तर वर्धन
शील) अवस्था विशेष को गुणस्थान कहते हैं । प्रश्न :-----गुणस्थान के कितने भेद हैं ? उत्तर :---गुणस्थान के १४ भेद हैं-१ मिथ्यात्व, २ मासादन, ३ मिश्र, ४ अविरत
सम्यग्दृष्टि, ५ देशविरत, ६ प्रमत्तविरत, ७ अप्रमत्तविरत, ८ अपूर्वक रग, ६ अनिवृतिकरण, १० सुक्ष्मसापराय, ११ उपशांत मोह. १२ क्षीरगमोह,
१३ सयोग केवली, १४ पायोग केवली । प्रश्न :--गुरणस्थानों के इस प्रकार के नामों का क्या कारण है ? उत्तर :-मोहनीय कर्म और योग ही इनका कारगा है। प्रश्न :--कौन-कौन से गुषस्थान का क्या-क्या निमित्त है ? उत्तर :-प्राथमिक चार गुणस्थान तो दर्शन मोहनीय कर्म के निमित्त से होते हैं।
पांचवें गुगास्थान से लेकर बारहवें गुणास्थान पर्यंत पाठ गुरास्थान चारित्र मोहनीय के निमित्त से होते हैं। तेरह्वां और चौदह्वां ये दो गुणस्थान . योग के निमित्त से होते हैं।
पहला गुणस्थान दर्शन मोहनीय के उदय से होता है। इसमें प्रात्मा ... के परिणाम मिथ्यात्त्वरूप होते हैं ।
चौथा गुणस्थान दर्शन मोहनीय कर्म के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम से होता है। इस गुणस्थान में आत्मा के सम्यग्दर्शन गुरण का प्रादुर्भाव हो जाता है।
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