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स. अध्याय : पला । .. तीसरा गुणास्थान सम्यमिथ्यात्वरूप दर्शन मीहनीय कर्म के उदय से
होता हैं । इस गुणस्थान में प्रौदयिक भाव, चौथे गुणस्थान में यात्मा के परिणाम सम्यङिमथ्यात्व अर्थात् उभयरूप होते हैं ।
पहिले गुणस्थान में प्रौदयिक भाव, चौथे गुणस्थान में औपशामिक क्षायिक अथवा. क्षायोपशमिभाव और तीसरे गुणस्थान में प्रौदयिक भाव होते हैं ।
. हन्त दूतार मुगवान दर्शन मोहनीय कर्म की उदय, उपशम, क्षय, और क्षयोपशम इन चार अवस्थानों में से किसी भो अवस्था की अपेक्षा नहीं रखता है । इसलिये यहां पर दर्शन मोहनीय कर्म की अपेक्षा से पारिरगामिक भाव है। किन्तु अनन्तानुबंधीरूप चारित्र' मोहनीय कर्म का उदय होने से इस गुणस्थान में चारित्र मोहनीय कर्म की अपेक्षा से प्रौदयिक भाव भी कहा जा सकता हैं । इस गुणस्थान में अनन्तानुवन्धी के उदय से सम्यवत्व का घात होता है । इसलिये यहां सम्यक्त्व नहीं है और मिथ्यात्व का भी उदय नहीं होता है। इसलिये मिश्यात्य परिणाम भी नहीं होता है । अतएव यह गुणस्थान मिथ्याल्व और सम्यक्त्व की अपेक्षा से अनुदय रूप है । इस गुणस्थान का समय यह प्रावली तक का है।
पांचवें गणस्थान से दशावें गास्थान तक छह गम्गस्थान चारित्र मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से होते हैं। इसलिये इन गुमास्थानों में क्षायोपक्षमिक भाव होते हैं ! इन गुणस्थानों में सम्यवचारित्र गुग की क्रम से वृद्धि होती हैं।
ग्यारहवां गुणस्थान चारित्र मोहनीय कर्म के उपशम से होता है । इसलिये ग्यारहवें गुणस्थान में औपशामिक भाव होते हैं । यद्यपि यहां पर चारित्र मोहनीय कर्म को पूर्णता या उपशम ही हो जाता है । तथापि योग का सद्भाव होने से पूर्ण चारित्र नहीं होता, क्योंकि सम्यत्रचारित्र के लक्षण में योग पोर कषाय के अभाव से सम्यक्चारित्र होता है-ऐसा लिखा है ।
. बारहवां गुरणस्थान चारित्र मोहनीय क्रम के अय से होता है । इस लिये यहाँ क्षायिक भाव होता है । इस गुरागस्थान में भी ग्यारचे गुणस्थान
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