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________________ ५६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि की तरह सम्यक्चारित्र की पूता नहीं होती, सम्यग्ज्ञान गुण यद्यपि चीये गुणस्थान में ही प्रगट हो जाता है । भावार्थ - यद्यपि श्रात्मा का ज्ञान गुण अनादिकाल से प्रवाह रूप चला आ रहा है तथापि दर्शन मोहनीय का उदय होने से वह ज्ञान मिथ्यारूप होता है, परन्तु चौथे गुरास्थान में जब दर्शन मोहनीय कर्म के उदय का प्रभाव हो जाता है, तब यही आत्मा का ज्ञान गुण सम्यग्ज्ञान कहलाने लगता है | और पंचमादि गुणस्थानों में तपश्चरण के निमित से अवधि, मन पर्यय ज्ञान भी किसी जीव के प्रगट हो जाते हैं । तथापि केवल ज्ञान के हुए विना ज्ञान की पूर्णता नहीं हो सकती । इसलिये इस बारहवें गुणस्थान:तक यद्यपि सम्यग्दर्शन की पूर्णता हो गई है, क्योंकि क्षायिक • सम्यग्दर्शन के बिना क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ता और क्षपक श्रेणी के विना १२ गुणस्थान नहीं होता, तथापि सम्यग्ज्ञान और सम्यदचारित्र गुण अब तक अपूर्ण है, इसलिये अब तक मोक्ष नहीं हुआ । तेरहवां स्थान योगों के सद्भाव की इसका नाम सयोग और केवल ज्ञान के निमित से गुस्थान में सम्यग्जान की पूर्णता हो जाती है, पूर्णता न होने से मोक्ष नहीं होता है । दहवां गुणस्थान योगों के प्रभाव की अपेक्षा है, इसलिये इसका नाम प्रयोग केवली है । इस गुणस्थान में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान:और सम्यक्चारित्र इन तीनों गुणों की पूर्णता हो जाती है। अतएव मोक्ष भी दूर नहीं रहता । अर्थात अ इ उ ऋ लृ इन पांच ह्रस्व स्वरों के उच्चारण करने में जितना काल लगता है, उतने ही काल में मोक्ष हों जाता है । अपेक्षा से होता है, इसलिये। संयोग केवली है । इस परन्तु चारित्र गुण की प्रश्न :- मिथ्यात्व गुणस्थान का क्या स्वरूप है उत्तर : --- मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से प्रतस्वार्थ श्रद्धान रूप आत्मा के परिणाम विशेष को मिथ्यात्व गुणस्थान कहते हैं। इस मिथ्यात्व गुम्मस्थान में रहने वाला जीव मिथ्या श्रद्धावान् होता है । तत्त्वार्थ श्रद्धा और रूची इसकी
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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