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[ गो. प्र. चिन्तामगि
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प्रश्न :- चौदह गुणस्थानों में 'सत्तावन' श्राश्रय कैसे हैं ?
उत्तर :- पहले गुणस्थान में पचपन प्राश्रव है, श्राहारकट्टिक के बिना | सासादन में ५० का प्राश्रव है पांच मिथ्यात्व श्राहारकठिक के बिना । मिश्र में तियालीस का आभव है, चार अन्तानुबंधी तीन मिश्र, पांच मिथ्यात्व दो ग्राहारक के बिना। चौथे में छियालीस का प्राश्रव है, ऊपर के ४३ और तीन मिश्र
से
होते हैं ।
वर में तीस का ग्राभव है- ऊपर के ४६ में से ४ कषाय, ४ योग, सबंध ये भी घटाने में ३७ का प्राथव होता है । प्रमत्त गुणस्थान में चौबीस का श्राश्रव है - कषाय १३, योग & ग्राहारक दो। सातवें में २२ ग्राश्रव हैं- -- कषाय १३, योग | आठवें में भी २२ का श्राश्रव है। नौवें गुरगस्थान में १६ का याथव है-नौ योग, चार संज्वलन तथा तीन वेदः । दसवें गुस्थान में १० का श्राश्रव नौ योग, एक सूक्ष्म लोभ । ग्यारह: गुस्थान में नौ योग का आश्रव होता है । और बारहवें में भी नी योग का 1 तेरहवें में 5 योग का ग्राभव काय ३ चौदह गुणस्थान में कोई भी ग्राश्रव नहीं है । प्रश्न :- -मरण समय कौनसी लेश्यावाला जीव कौनसी गति में जाता है ? उत्तर :- शुक्ललेश्या के उत्कृष्ट ग्रंथ से मरा हुया जीव सर्वार्थसिद्धि को ही जाता है। यहां देवायु की उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर की होती है। शुक्ललेश्या के मध्यम अंश से मरा हुआ जीव ग्रानत नाम तेरहवें स्वर्ग से लेकर विजयाद चार अनुत्तर विमानों तक में पैदा होता है । तथा शुक्ललेश्या के जघन्य अंश से मरकर शतार सहस्त्रार नाम के स्वर्ग - जन्मता है । पद्मश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर सहस्त्रार नाम के बारहवें स्वर्ग में तथा उससे जघन्य अंश से मरकर सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में पैदा होता है । तथा पद्मलेश्या के मध्यम अंश से मरकर सहस्त्रार से नीचे सनत्कुमार, माहेन्द्र के ऊपर यथा योग्य जन्मता है। तेज या पीतलेश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर सनत्कुमार, माहेन्द्र स्वर्ग के अंत के पटल में चक्र नाम के इन्द्रक सम्बन्धी श्र ेणीबद्ध विमानों में उपजता है । तेजलेश्या के जघन्य ग्रंश से मरकर उसके सीधर्म ईशान स्वर्ग का पहिले रितु नाम के इन्द्रकः या इसके श्रग्रीवद्ध विमानों में
वचन २, मन र साल
ये