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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग प्रजानां यवृधेहर्षः सुराविस्मयमाश्रयन् । अम्लानि कुसुमान्युसचैः मुमुचुः सुरभूरूहाः ॥१५६७॥
प्रजा का हर्ष बढ़ रहा था, देव आश्चर्य को प्राप्त हो रहे थे और कल्पवृक्ष ऊँचे से प्रफुल्लित पुष्पों की वर्षा रहे थे। .
अनाहताः पृथुध्वाना दध्वनुदिविजानकाः । - मृदुः सुगंधिशिशिरो मरुन्मंदं सदाबयौ ॥१५६८।।
देवों की दुन्दुभि अपने-आप ऊँचा शब्द करते हुये बज रही थीं । कोमल शीतल और सुगंधित पवन मंद-मंद बह रहा था।
प्रचचालमहीतोषात् नृत्यन्तीव चलगिरिः ।। उद लो जलधिनमगमत् प्रमदं परम् ।।१५६६।।
उस समय पहाड़ों को कंपित करती हुई पृथ्वी भी हिलने लगी थी। मानो आनन्द से नृत्य ही कर रही हो । समुद्र की लहरें सीमा के बाहर जाती थीं, जिससे सूचित होता था कि वह परम आनन्द को प्राप्त हुआ था। मुनिसुव्रत काव्य में लिखा है--
गृहेषु शंखाभवनामराणां, बनामराणां, पटलाः पदेषु । ज्योतिस्सुरागां सदनेषु सिंहाः, कल्पेषुघंटा: स्क्यमेवनेदुः ॥५५७०॥
प्रभु के जन्म होते ही भवनवासियों के यहां शंख ध्वनि होने लगी। व्यंतरों के यहां भेरीनाद होने लगा । ज्योतिषी देवों के यहां सिंहनाद तथा कल्पवासियों के यहां स्वयमेव घंटा बजने लगा।
उस समय सौधर्मेन्द्र का ग्रासन कंपित हुमा तथा उनका मस्तक भुक गया था, सौधर्मेन्द्र' चकित हो सोचने लगे कि यह किस निर्भय, कारहित, अत्यन्त बाल स्वभाव, मुग्ध प्रकृति, स्वछन्द भाव वाले तथा शीघ्र करने वाले व्यक्ति का कार्य है । हरिवंश पुराण में कहा है- ..
प्रासनस्य प्रकपेन, दथ्यो विस्मित धीस्तथा । सौधर्मेन्द्रश्चलन्मौलिभूत्वा मूर्धानमुमतम् ।।१५७१।।। अतिबालेन मुराधेल. स्वतंत्रणाशुकारिगा । निर्भयेन विशंकेन केनेदमप्यनुष्ठितम् ॥१५७२।।
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