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________________ अध्याय : पाठवां ] [ ६४१ गर्भ बसन्नपि मलेरकलंकितांगो,. ज्ञानत्रयं त्रिभुवनैक: गुतर्षभार । .. तुगोदयाद्रि गहनांतरितोपि धाम, . किं नाम मुंचति कदाचम तिम्मरश्मिः ॥१५६५॥ . अर्थात्-वे जिन भगवान गर्भ में निवास करते हुए भी मल से अकलंक अंग युक्त थे, त्रिभुवन के अद्वितीय गुरु उन प्रभु ने मति, श्रुत तथा अवधि इन ज्ञानत्रय को धारण किया था । उन्नत उदयाचल के गहन में छिपा हुआ भी तिग्मरश्मि अर्थात् सूर्य क्या कभी अपने तेज को छोड़ता है ? जन्मकल्याणक-प्राची दिशा के गर्भ में सूर्य सदृश जिन जननी के गर्भ में छिपे हुये वे धर्मसूर्य जिनेन्द्र भव्यों को अधिक हर्ष प्रदान कर रहे थे। किन्तु जिस समय उन प्रभु का जन्म हुआ, उस समय के अानन्द और शान्ति का कौन बर्णन कर सकता है ? अन्तःकरणों में सभी जीवों ने जिनेन्द्र जन्म-जनित ग्रानन्द का अनुभव किया । त्रिभुवन के सभी जोयों को सुख प्राप्त हुआ। जन्म के समय जननी को कोई कष्ट नहीं हुआ । देवियाँ सेवा में तैयार थीं। - उस समय नैसर्गिक वातावरण अत्यन्त रमणीय और सुन्दर हो गया । नभोमंडल अत्यन्त स्वच्छ था । मंद सुगन्ध पवन का संचार हो रहा था । आकाश से सुगन्धित पुष्पों की वर्षा हो रही थी। उससे प्रतीत हो रहा था कि समस्त प्रकृति प्राकृतिक मुद्रा को पार कर प्रात्मा की वैभाविक परिणति का त्याग कर अपनी प्राकृतिक स्थिति को ये जिनेन्द्र शीघ्र ही प्राप्त करेंगे, इसलिए सचेतन एवं अचेतन प्रकृति के मध्य एक अपूर्व उल्हास और प्रानन्द की रेखा दिखाई पड़ती थी। प्रश्न-जन्म समय में कौनसे चिन्ह प्रकट होते हैं ? उत्तर :--जन्म समय के चिह्न -महापुराण में जन्म के समय हुई मधुर __ बातों का इस प्रकार वर्णन किया है--- विशः प्रसत्ति मासेदुः प्रासोनिमलमम्बरम् । गुरणानामस्य धमल्यं अनुकत्तुं मिय प्रभोः ॥१५६६।। उस समय समस्त दिशाएँ स्वच्छता को प्राप्त हुई थी और आकाश भी निर्मल हो गया था। उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो भगवान के गुणों की निर्मलता का वे अनुकरण कर रहे हों। .... .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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