________________
अध्याय : पाठयां ] इन्द्र महाराज पुन: चिन्ता निमग्न होकर विचार करते हैं
देवदानवचनस्यस्वपराकम शालिनः। . कथंचित्प्रतिकूलस्य यः समर्थः कदर्थने ।।१५७३।। इन्द्रः पुरंदरः शक्रः कथं न गरिणतोऽधुना ।" . सोऽहं कपयंतानेन सिंहासनमपितम् ॥१५७४।।.. .
अपने पराक्रम से शोभायमान भी देव-दानव समुदाय के किंचित् प्रतिकूल होने पर जो उनके दमन करने की सामर्थ्य धारण करता है, ऐसे शक्र, पुरन्दर, इन्द्र नामधारी मेरे अपित सिंहासन को कंपित करते हुये, उसने मेरी कुछ भी गणना नहीं की।
फिर सौधर्मेन्द्र के चित्त में एक बात उत्पन्न हुई कि तीनों लोकों में ऐसा प्रभाव तीर्थङ्कर भगवान के सिवाय अन्य में संभावनीय नहीं है - 'संभावयामि नेहेत्थप्रभावं भुवनत्रये प्रभु तीर्थकरादन्यम्' पश्चात् अवधिज्ञान द्वारा ज्ञात हो भैया कि भरत क्षेत्र में महाराज नाभिराज के यहां ऋषभनाथ तीर्थकर का जन्म हुआ है । तत्काल ही वह विस्मय भाव महान प्रानन्द रस में परिणित हो गया। 'जयतां जिन इत्युक्त्वाप्रगनाम कृतांजलिः' (१२८ सर्ग ८) जिनेन्द्र भगवान जयवंत हो ऐसा कहकर सात पैर जा हाथ जोड़कर जिनेन्द्र भगवान को परोक्ष रूप से प्रणाम किया। प्रश्न :---भगवान का जन्म लो अयोध्या में हुश्रा और उनके जन्म की सूचना
देने वाली वाद्य-ध्वनि स्वर्ग लोक में होने लगी। इन्द्रों के मुकुट झुक गये । इस विषय में क्या कोई वैज्ञानिक समाधान भी है या
नहीं ? उत्तर :--जिनागम में जगद्व्यापी एक पुद्गल का महास्कंध माना है, वह सूक्ष्म है । अाज के भौतिक शास्त्रज्ञों ने 'ईथर' नाम का एक तत्वं माना है, जिसके माध्यम से हजारों मील का शब्द रेडियो यन्त्र द्वारा सुनाई पड़ता है । इस विषय में आगम का यह आधार ध्यान देने योग्य है । तत्वार्थसूत्र में पुद्गल के शब्द, बन्ध आदि भेदों का उल्लेख करते हुए उसका भेद सुक्ष्मता के साथ स्थूलता भी बताया है। तत्वार्थ राजवार्तिक में लिखा है, 'द्विविध स्थौल्यमवगंतव्यं तत्रांत्यं जगद्व्यापिनि महास्कंधे ।' (अध्याय ५ सूत्र २४), दो प्रकार की स्थूलता कही गई है । पुद्गल की अन्तिम स्थूलता जगत् भर में व्याप्त महास्कन्ध में है। इस महास्कन्ध के माध्यम से