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________________ ६४४ ] [ गो. प्र. चिन्तामरित जिनेन्द्र जन्म की सूचना तत्काल संपूर्ण जगत को अनायास प्राप्त हो जाती है । इस महास्कन्ध तत्व का स्वरूप किसी भी एकान्तवादी सिद्धान्त में नहीं बताया गया है, कारण वे एकांतवाद अल्पक्षों के कथन पर आश्रित हैं, और जैन धर्म सर्वश के परिपूर्ण ज्ञान तथा तदनुसार निर्दोष वाणी पर अवस्थित है । प्रश्न : - इन्द्र की सात प्रकार की सेना कौन सी है ? उत्तर :- इन्द्र की सात प्रकार की सेना - सिद्धान्तसार दीपक में लिखा है कि इन्द्र महाराज की सवारी के आगे-आगे सात प्रकार की सेना मधुर गीत गाती हुई चलती थी। अभियोग्य जाति के देवों ने गज, तुरंग आदि का रूप धारण किया था । देवगति नामकर्म का उदय होते हुये भी अल्प पुण्य होने के कारण उन अभियोग्य जाति के देवों को विविध प्रकार के वाहन आदि का रूप धारण करना पड़ता है । ऐसी ही दशा fafeoधिक देवों की हीनपुण्य होने के कारण होती है । वे अशुद्ध freurt न होते हुये भी शुद्रों • समान उच्च देवों से पृथक् गमनादि कार्य करते हैं । जिनेन्द्र जन्मोत्सव के समय उनका कहां स्थान रहता है, यह पृथक् रूप से उल्लेख नहीं किया गया है । तीन लोक के स्वामी तीर्थंकर का जन्म जानकर देवों की हाथी, घोड़ा, रथ गंधर्व, पदाति, बैल तथा नृत्य कारिणी रूप धारी सात प्रकार की सेना इन्द्र महाराज की आज्ञा से निकली । उस समय शोक, विषाद आदि विकारों का सर्वत्र प्रभाव हो गया था । सर्व जगत श्रानन्द के सिंधु में निमग्न था । शांति का सागर दिदिगंत में लहरा रहा था । इन्द्र की सात प्रकार की देव सेना तीर्थंकर आदि का गुणानुवाद तथा नृत्य गायन करती हुई चलती है। इस सम्बन्ध में यह कथन ज्ञातव्य है :--- सात प्रकार की देवसेना का स्वरूप a a free गुण किस, स्वर में गाते हुये चलते थे ? . पहली --- गजरूप धारी देवों की सेना षडज स्वर में विद्याधर कामदेव श्रादि का गुणगान करती थी । दूसरी - तुरंगरूप धारी देवों की सेना ऋषभ स्वर में मांडलिक, महामांडलिक तीसरी रथरूपधारी देवों की सेना राजाओं का गुणगान करती थी । गांधार स्वर में बलभद्र नारायण,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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