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________________ meastsee MisseuAINTAMANMOHometim ateussemamaNAMAHARASHN ATRASADS तीर्थंकरों के निर्वाण-मोक्ष का कल्याणक ७५८ ] क्रमांक मोक्ष प्राप्ति की तिथि प्रादि-- निर्वाण क्षेत्र प्रायु के अन्त में समय नमर- निवारण क्षेत्र यक्षिणियों योग निरोध या विहार बंद होने के बाद मोक्ष की तिथि हरिबंश. नक्षत्र.. पर्वतादि - का विशिष्ट के नाम विहार कब बंद, समवशरण की स्थिति | स्थान ! किया था ! कैसी रहती है? - ७७ | ७ | ६ ७६ १ माघ कृ. १४ पून्हि उत्तराषाढ कैलास पर्वत - च वरी १४ दिन पहले रोहिणी (अजिता एक मास पहले प्रशस्ति (नम्र) अन्य साला (दुरितारी).. पुस्षमत्ता (संसारी) मनोचेमा (मोहनी) काली (मालिनी) উলাল গালি महाकाली (भृकुटी) मानवी (यानु) मौरी (मोमघकी) गांधारी (विश्रुतमाली) । श्री तीर्थकर कवली भगवान प्रायु के अत समय जब बिहार बंद करके योग गिरोध करते हैं, तब एक ही स्थान में यथायोग्य झासम लगाकर निशचल रहते हैं। हलम बलम हा कार योग की क्रिया उपदेश रूप वचन योग की क्रिया सब बंद हो जाती हैं। उनका सभी पुण्य नाण होने से समवशरण को रचना नहीं रहती है। बारह प्रकार की सभा जब विधटित होकर समा के सर जीव हाथ जोड़कर रहते है, प्रभु के पास रहने वाले . सब प्रमुख देवता चले जाते हैं । श्री ऋषभ नाथ भगवान के योग । रोहिणो सम्मेदशिखरजी सिद्धवर फूट ६ , मृगशिर धवलदत्त कूट शु. ३ . पुनर्थस् , मानन्द कट ११ , मया अविचन कूट कृ. ४ , विधा मोहन कूट अनुराधा সমাম কুর ज्येष्ठा ललित कूट सुप्रभ कुट आश्विन शु. ६ , पूर्वाषाढ़ , विद्युत्तम कूट (बिदार कुट) श्रावण शु. ३० . धनिष्ठा संकुल कूट (संचल कूट) माद्रपद शु. १४ अपराह्न अश्विनी मंदारगिरी चम्पासाल वन (चम्पापुरी) (मनोहर बन) [ मो. प्र. चिन्तामणि ११ १२
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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